हिंदी पखवाड़े का प्रहसन

    क्या देश की संस्कृति और साहित्य को सिर्फ राष्ट्र भक्ति के नारे बचायेंगे?

    अंग्रेजी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, नौकरशाही, न्याय सभी को बर्बाद कर दिया

    अपनी भाषाओं को न जानने वालों को क्या इस देश का शासन सौंपा जाना चाहिए?

    प्रेमपाल शर्मा

    देश के कोने-कोने में समझी, गीतों में गुनगुनाने वाली हिंदी भाषा-साहित्‍य की स्थिति उतनी दयनीय नहीं है, जितनी दीनता से प्रचारित की जा रही है. मेरे सामने बैठी है एक मेधावी छात्रा- सिविल सेवा परीक्षा की उम्‍मीदवार. उसे शेर से उतना डर नहीं है, जितना टपके से.. यानी यूपीएससी की परीक्षा अंग्रेजी में देने वाली को हिंदी में फेल होने का डर सता रहा है. बाकी सब में आश्वस्त है. हिंदी में सिर्फ क्‍वालीफाई करना है और इसका स्‍तर है सिर्फ मैट्रिक. मेरठ की इस छात्रा को मैं समझाता हूं कि इस हिंदी में खड़ी बोली का जन्‍म तो तुम्‍हारे क्षेत्र से ही हुआ है और दसवीं तक तो पढ़ी ही है आदि आदि. उसका डर सुनिए – ‘न बोलने का अभ्‍यास है, न लिखने का. पहली क्‍लास से ही दिल्‍ली में अंग्रेजी में पढ़ाई हुई है. हिंदी में जैसे-तैसे पास होती रही. पिछले सात-आठ सालों से तो एक शब्‍द नहीं लिखा. हिंदी होती भी तो बहुत कठिन है- मात्राएँ, बिंदु..’ ऐसा नहीं कि हिंदी समाज के ही हिस्‍से इनके मां-बाप को हिंदी में कमजोर होने का पता न हो, मगर हिंदी न आना तो उनके रूतवे को बढ़ाता ही है. पूरा देश ही इस ग्रंथि का मारा है.

    सितंबर महीने में ऐसी बातें सुनकर और भी दिल बैठ जाता है, लेकिन हिंदी अधिकारियों के चेहरे पर चमक इन्हीं दिनों आती है. विशेषकर मालदार विभाग, तेल कंपनियां, उपक्रम, बैंक, जो हिंदी के नाम पर फूहड़ प्रतियोगिताओं के लिए गिफ्ट खरीदने निकल पड़ते हैं. सरकारी गाड़ियों में होटल तलाशते लंच, डिनर. पिछले साठ सालों से वैसी ही कवायद बल्कि प्रतिवर्ष और गिरावट!

    दोहराने की जरूरत नहीं कि हिंदी की ऐसी स्थिति हमारी शहरी शिक्षा व्‍यवस्‍था ने सबसे ज्‍यादा की है. किसे नहीं पता कि अंग्रेजी के पब्लिक स्‍कूल में हिंदी बोलने पर सरेआम दंड की व्‍यवस्‍था है. स्‍कूलों ने अपने शिक्षकों को आदेश दे रखे हैं हिंदी न बोलने के. हिंदी का शिक्षक भी नहीं बोलेगा हिंदी में, हर क्‍लास के मॉनिटर को भी यह काम सौंपा गया है और एक विशेष खुपिया टीम को भी. स्‍कूल से बाहर करने तक की धमकी. रही-सही कसर हिंदी का शिक्षक पूरी कर देता है, जो जापानी, फ्रेंच, अंग्रेजी की तरह न नंबर देने में उदार है, न उसे बीस-तीस साल पहले पढ़ी कोर्स की किताबों के अलावा हिंदी की नवीनतम पुस्‍तकों की कोई जानकारी, जिससे अपने वह विद्यार्थीयों को प्रोत्‍साहित कर सके. उसकी बला से पढ़ो तो भला, न पढ़ो तो और भी भला. जब भी स्‍कूली बच्‍चों से बात हुई और उनसे उनके प्रिय अध्‍यापक जानना चाहा, हिंदी शिक्षक सबसे पीछे रहता है. आखिर हिंदी वही पढ़ और पढ़ा रहा है न, जिसे किसी कालेज के किसी और विषय में दाखिला नहीं मिला और फिर न कोई और नौकरी. ऊपर से रात-दिन की धर्मवादी, जातिवादी राजनीति सब कुछ सिखाती है पढ़ना लिखना छोडकर. खामियाजा भुगत रहा है पूरा हिंदी समाज, उसकी भाषा, उसका साहित्‍य.

    कारणों का अंत यहीं नहीं है. दिल्‍ली की एक मशहूर दूकान में मुझे प्रेमचंद के उपन्‍यास ‘गोदान’ की तलाश थी. लगभग दस हजार किताबों के बीच एक कोने में हिंदी की कुछ किताबें थीं. ढूंढ़ते-ढूंढ़ते यह पता लगा कि 12वीं तक अंग्रेजी की दर्जनों पुस्‍तकें, उपन्‍यास, कहानी, डायरी, यात्रा, अध्‍यात्‍म सहित पूरक पुस्‍तक के रूप में हर क्‍लास में लगा रखी है. अच्‍छी बात. जाहिर है अंग्रेजी दुरस्‍त करने के प्रयास में ज्‍यादा. बस्ते का बोझ बढ़े तो हमारी बला से. जब न सरकार टोके, न अभिभावक और इस रास्ते मुनाफा भी स्‍कूल को हो, तो हिंदी सप्‍ताह में रोने वालों की कौन सुने? हिंदी पखवाड़ा तो ये स्‍कूल भी अंग्रेजी में उसी जश्‍न से मनाते हैं जैसे पूरी भारत सरकार.

    क्‍या स्‍कूल में नन्‍हें-मुन्ने बच्‍चों को अपनी भाषा में बोलने-खेलने से इतनी क्रूरता से मना करना मानवाधिकारों का उल्‍लंघन नहीं है? कहां हैं वे हिंदी के दिग्‍गज पत्रकार, लेखक, राष्‍ट्रवादी, धर्मवादी, दलित मंच.. जो संविधान, मानवाधिकार, मानवीय गरिमा, अस्मिता के नारे लगाते हुए एक बहादुर सिपाही की तरह यू्एनओ तक पहुंच जाते हैं, लेकिन अपनी भाषा के मुद्दे पर उतने ही कायर. हिंदी के ऐसे अखबारों की संख्‍या भी लगातार बढ़ रही है, जो अंग्रेजी सिखाने के काम से प्रचार और प्रसार पा रहे हैं. हिंदी के गाल पर सबसे बड़ा तमाचा तो दिल्‍ली, नौएडा, ग्रेटर नौएडा में गगनचुम्बी रिहायसी सोसाइटियों के नामों ने लगाया है- जे. पी. ग्रीन, व्‍हाइट हाउस, अल्‍फा, वीटा, गामा इत्यादि.

    हालांकि इसकी शुरूआत मयूर विहार, दिल्‍ली की उस ‘समाचार सोसायटी’ से हुई है, जिसके चारों नाम अंग्रेजी में लिखे हुए हैं. अफसोस यहां कई ऐसे हिंदी के महान लेखक, पत्रकार रहते हैं, जो हिंदी के नाम पर करोड़ों का वारा-न्‍यारा कर चुके हैं और सितंबर माह में फिर किसी होटल में होंगे. ‘समाचार’ शब्‍द भी तो मूलत: हिंदी का ही है. ‘समाचार’ की ही प्रेरणा से कला विहार के हिंदी के साहित्‍यकार, कलाकार भी नोटिस बोर्ड पर अपनी बात अंग्रेजी में ही कहते हैं- बचते हुए कि कहीं हिंदी वाले न मान लिए जाएं. ‘हिंदी वाला’ मतलब जैसे हिंदू धर्म और गाय की तरह ज्‍वलनशील!

    हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं में पढ़ने वालों के लिए यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में पहली बार खिड़की खुली थी वर्ष 1979 में– डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी की सिफारशों से. तब सरकार थी जनता पार्टी की और प्रधानमंत्री थे मोरारजी देसाई. इसे खिड़की इस रूप में कहेंगे कि केंद्र की कई राष्ट्रीय परीक्षाओं– वन सेवा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि में नहीं, केवल सिविल सेवा में, लेकिन अंग्रेजी में पास करना इसमें भी अनिवार्य था. चालीस साल बाद भी अन्य परीक्षाओं में अपनी भाषाओं में यह नहीं है. और तो और तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2011 में अंग्रेजी सिविल सेवा के पहले चरण सी-सेट में लाद दी थी. पूरे देश में इसके खिलाफ आंदोलन हुआ, तब नई सरकार ने 2014 में कांग्रेसी सरकार के इस आदेश को पलटा. लेकिन अन्य परीक्षाओं में आज भी हिंदी और भारतीय भाषाएँ नहीं हैं. पूरी तरह अंग्रेजी का दबदबा. सिविल सेवा परीक्षा में 95 प्रतिशत अंग्रेजी माध्यम वाले ही चुने जाते हैं. देश के एक एक पद पर जातिवार गणना करने वाले भी अंग्रेजी के आतंक में चुप्पी साधे रहते हैं.

    प्रश्न यह भी है कि क्या देश की भाषाओं को न जानने वालों को इस देश का शासन सौंपा जाना चाहिए? कोठारी आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जिन्हें भारतीय भाषाएं नहीं आतीं, उन्हें इन सेवाओं में आने का कोई अधिकार नहीं है. इन्हें न केवल भाषाएं, बल्कि भारतीय साहित्य का भी ज्ञान होना चाहिए– देश के समाज को समझने के लिए. लेकिन बावजूद ऐसी सिफारशों के अंग्रेजी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, नौकरशाही, न्याय सभी को बर्बाद कर दिया. मौजूदा सरकार भी धीरे-धीरे कांग्रेसी राह पर ही चल रही है. स्टाफ सेलेक्शन कमीशन, जो सारे मंत्रालयों के लिए हर साल बीस हजार कर्मचारियों की भरती करता है, में तो अंग्रेजी और भी कठिन स्तर की है. नतीजा सारा देश अंग्रेजी की कोचिंग के हवाले. क्या संस्कृति, साहित्य को सिर्फ राष्ट्र भक्ति के नारे बचायेंगे?

    ऐसे दुर्भाग्‍यपूर्ण, दयनीय समय में बच्‍चों को हिंदी से डर लगने लगे तो क्‍या आश्‍चर्य. अपनी भाषा सीखने के लिए जब न शिक्षा, स्‍कूल मौका दे, न समाज, न नौकरी की परीक्षाएं, तो सितंबर का पखवाड़ा भी क्‍या जुम्बिश भरेगा? वैसे भी स्‍मृति-पर्व तो मुर्दा चीजों के ही मनाए जाते हैं.. जय हो...!!

सम्पादकीय