सैक्यूलरज्मि के गुनाह !!!

    समाज और मीडिया के ठेकेदार जाति और सेकुलरिज्म की आड़ में कर रहे हैं राजनीति

    सैक्यूलरिज्म की आड़ में भ्रष्‍ट, वंशवादी लोकतंत्र की सत्ता पर काबिज रहने का अचूक तालमेल

    हिंसक अंदाज में एक लोकतांत्रिक सरकार को बेदखल करने पर उतारू है तथाकथित सैक्यूलर खेमा

    प्रेमपाल शर्मा*

    हत्या, आत्महत्या, बलात्कार जैसी वारदातें किसी भी समाज के लिए दुखद हैं, लेकिन समाज और मीडिया के ठेकेदारों द्वारा जाति और सेकुलरिज्म की आड़ में राजनीति करना और भी दुखद है. यह मामला एक विश्वविद्यालय का है और वहा सरकारें भी दूसरें दलों की हैं, लेकिन तोप का मुंह फिर मोदी सरकार की ओर हो गया है. पूरे विपक्ष को मोदी सरकार फूटी आंख बर्दास्त नहीं हो रही है. भेड़िए को तो मेमने को खाना है. बेरोजगारी, हताशा, प्रेम-प्रसंग, प्रतियोगिता की दौड़, अवसाद आदि कारणों से सैकड़ों नौजवानों की आत्महत्याओं की खबरों से अखबार भरे पड़ें हैं. पिछले दस सालों में दो लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्याओं पर भी इतनी चीख पुकार नहीं मची. और तो और शीर्ष वैज्ञानिकों द्वारा भ्रस्टाचार, भाई-भतीजावाद और नाइंसाफी के कारण हुई आत्महत्याएं भी वंशवादी कुशासन में अनसुनी रह गईं.

    मालदा में बिना किसी कारण इतनी भीड़ उमड़ी, इतनी हिंसा हुई, लेकिन देश के शायद ही किसी राजेनता, बुद्धिजीवी, कलाकार ने सुनी हो. थाने में आग लगाने की वारदात तक को मीडिया ने दबाए रखा. कलकत्ता में ही उस निरपेक्ष मुस्लिम शिक्षक को भी मारा-पीटा गया, जो स्कूली बच्चों को राष्‍ट्रगान सिखाता था. क्या राष्‍ट्रगान सिखाना असंवैधानिक, अपराध है? क्या एक धर्म विशेष को कट्टरता के नाम पर शिक्षा, बराबरी के राष्‍ट्रीय मूल्यों की भी बलि दी जाती रहेगी? ऐसा यदि कोई हिन्दूवादी संगठन करता, तो क्या तब भी मीडिया, बुद्धिजीवी माहौल की इतनी ही चिंता करते?

    तर्क दिए गए कि माहौल को बिगड़ने से रोकेने के लिए खबरों को रोका गया. अच्छी बात है. लेकिन अब फिर हाहाकार क्यों? पिछले लगभग दो साल से तो पूरा देश यह देख रहा है कि तथाकथित सैक्यूलर खेमा कितने हिंसक अंदाज में एक लोकतांत्रिक सरकार को बेदखल करने पर उतारू है. सड़क से लेकर संसद तक और गली-मोहल्ले से लेकर यूएनओ तक.

    हाल की ये चंद घटनाएं आजादी के बाद के भुरभुरे भारतीय लोकतंत्र की पोल-पट्टी खोलने के लिए पर्याप्त हैं. पश्चिम बंगाल में तो मुस्लिम आबादी वैसे भी 25 प्रतिशत के लगभग है. जहां कम भी है, वहां भी इसी वोट बैंक के भरोसे भ्रष्‍ट, वंशवादी लोकतंत्र लगातार कायम है. इसकी जड़ में है सैक्यूलरिज्म की आड़ में सत्ता पर काबिज रहने के लिए भ्रष्टाचार और वंशवाद का अचूक तालमेल. आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में शुरु हुआ यह गठबंधन उत्तरोत्तर मजबूत ही होता गया है. देश, उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं चाहे कितनी भी कमजोर हो गई हों, भ्रष्टाचार और वंशवाद का सबसे ज्वलंत उदाहरण हाल ही में चुनकर आई बिहार सरकार है. उसमें नीतिश कुमार नहीं जीते, वे लालू प्रसाद जीते हैं जिन पर भ्रष्‍टाचार के कारण चुनावी प्रतिबंध है और उन्होंने कांग्रेसी वंशवाद से सीख लेकर उस बेटे को उप-मुख्यमंत्री मनोनीत किया जो नौवीं भी पास नहीं कर पाया. क्या उनकी अपनी ही पार्टी में अनुभवी जमीनी वरिष्‍ठ नेताओं का इतना टोटा था? या फिर लोकतात्रिक परपंराओं को ताक पर रखकर लोकतंत्र की धुरी समझी जाने वाली राजनीतिक पार्टी जैसी संस्थाओं को विकसित होने ही नहीं दिया गया. इससे पहले भी भ्रष्‍टाचार के ऐसे ही आचरण के बाद मुख्यमंत्री पद पर राबड़ी देवी को बिठा दिया गया था, जिन्हें बर्षों तक बिहार की नौकरशाही अक्षर ज्ञान सिखाने की कोशिश में लगी रही थी. देश और दुनिया को दिखाने के लिए इनके पास बस तुरुप का एक ही पत्ता है, हम सेक्यूलर हैं. हम साम्प्रदायिक व्‍यक्तियों को सत्ता में नहीं आने देंगे.

    इस आड़ में पाई सत्ता ने पूरे भारतीय लोकतंत्र को ही दुनिया के सामने मजाक बना दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष एक दशक से ज्यादा ही उस पद पर हैं. वैसे ही लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, मायावती और तो दूर दक्षिण की तथाकथित सैक्यूलर डीएमके आदि भी. वंशवाद का यही खेल कश्मीर की सियासत में कायम है, उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के तो नौ सासंद एक ही कुनबे के हैं. सैक्यूलरिज्म का आवरण कैसे समाजवाद को जन्म देता है, यह इसके ताजा उदाहरण हैं.

    दिवंगत मशहूर पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी नई किताब ‘अनप्लग्ड एडीटर’ में ठीक ही लिखा है कि लालू, मुलायम, करूणानिधि, शिवसेना सहित को तो कांग्रेस का आभारी होना चाहिए. यदि कांग्रेस में वंशवाद नहीं होता, तो आज ये भी कहीं नहीं होते.

    सत्ता की सुविधाओं के बूते नौकरशाही, मीडिया और बुद्धिजीवियों को खरीदकर उन्हें साम्प्रदायिक विरोध के ऐसे बैंड में बदल दिया गया कि वो आज तक भ्रष्‍टाचार और वंशवाद को लोकतंत्र का जहर मानने से भी इंकार करते हैं. कांग्रेस द्वारा प्रचारित यह फार्मूला इतना सफल रहा कि पहले दो दशकों तक कांग्रेस निविर्वाद रूप से देश की सत्ता पर काबिज रही. उसके बाद वे क्षेत्रीय दल सफल रहे, जिन्होंने भ्रष्‍टाचार और वंशवाद, भाई-भतीजावाद पर कभी चोट ही नहीं की. कोई भी ऐसा कदम जिसमें यह संतुलन बिगड़ सकता था, नहीं छुआ गया. जनसंख्या नीति से मुसलमान ज्यादा प्रभावित होते, अतः उसे भी छोड़ दिया. न केवल कांग्रेस, बल्कि वे वामपंथी दल भी, जो वंशवाद और कुछ हद तक भ्रष्टाचार से मुक्त हैं, उन्होंने भी इसे नहीं छुआ.

    भ्रष्‍टाचार और वंशवाद का यह तांडव केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश का शायद ही कोई संस्थान इससे अछूता हो. शर्त केवल यह रही कि माथे पर आपके सैक्यूलर तिलक लगा हो या दूसरों को दिखे. शिक्षा, विश्‍वविद्यालय इससे सबसे ज्यादा बरबाद हुए.

    नाम विश्‍वविद्यालय लेकिन न उनमें दुनिया के छात्र न शिक्षक. वंशवाद, जातिवाद और सेकुलर राजनीति के आदर्श उदाहरण बन गए. भाई-भतीजावाद के नाम पर होने वाली नियुक्तियां, भ्रष्‍टाचार नहीं इनकी परिभाषा में सैक्यूलर, पवित्र काम हैं. अच्छी बात है कि देश की दक्षिणपंथी पार्टी ने दो प्रधानमंत्री दिए हैं और दोनों पर ही वंशवाद की छाया दूर-दूर तक नहीं है. पूरी पार्टी ही इससे दूर रहे और उस नकली सेकुलरवाद से तो और भी अच्छा हो. न कभी गुजरात जैसी घटना हो. गाय, सरस्वती, पुष्‍पक विमान जैसी अतिश्‍योक्तिपूर्ण बातों से भी दूर रहना होगा. आधुनिक भारत बनाने के लिए यूरोपीय सभ्यता और समाज से भी सीखने में कोई हर्ज नहीं है.

    महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में एक प्रसंग है. गांधी जी से एक धर्म विशेष के नुमाइदे ने कहा कि आप यदि उनकी शरण में आ जाएं, तो फिर आप जो भी गलत, पाप कर्म करेंगे, सब माफ हो जाएंगे. गांधी जी का प्रत्युत्तर था, ‘इससे तो मैं और पाप करने लगूंगा.’ सैक्यूलरिज्म की आड़ ने सत्ता की खातिर हमारे नेताओं को यही भरोसा दिया है भ्रष्‍टाचार, वंशवाद, जातिवाद, एक तरफी साम्प्रदायिकता, सब माफ. और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता-सुख लोकतंत्र के मुखौटे में मिलेगा सो अलग. हैदराबाद, मालदा और देश के दूसरे हिस्सों में हो रही घटनाएं बार-बार यही गुनाह सिद्ध करती हैं.

    *लेखक रेल मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव और जाने-माने लेखक हैं.

सम्पादकीय