सावधान ! तैयारी ‘सिविल सर्विस’ जारी है..!!

    व्यंग्य : रवीन्द्र कुमार*

    पहले कहावत थी कि जिसने सिविल सर्विस पास नहीं किया, उसका जीवन समझो व्यर्थ ही गया. कहां कलेक्ट्री, कहां ये टुच्ची-मुच्ची नौकरियां. लोग कंप्यूटर का कितना ही बखान कर लें या फिर डॉक्टर, इंजीनियर बन जाएं, मगर जो बात सिविल सर्विस में है, आरएएस, पीसीएस में है, वह इनमें कहां, तभी तो डॉक्टर, इंजीनियर भी सिविल सर्विस की ओर भाग रहे हैं. उन्हें पता है कि सारी उम्र सीमेंट में रेत मिलाते रहें या मरीजों के बे-फालतू के टेस्ट कराते रहें, तो भी इतना रौब-दाब और धन न कमा पाएंगे, जितना सिविल सर्विस वाले एक पोस्टिंग में पीट लेते हैं. ससुराल में, सोसायटी में दबदबा, सो अलग.

    जैसे पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, वैसे ही अपने राम की हायर सेकंडरी में दो बार फेल होने पर उज्जवल भविष्य की तस्वीर साफ हो गई थी. मैंने गाना शुरू कर दिया था, “पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा”.. इधर शहर के एक थके हुए कॉलेज से बीए पास की, उधर मैंने घर में डिक्लेयर कर दिया “मैं तो आईएएस बनूंगा”, सुनते ही मेरे पिता जी ने मुझे गले से लगा लिया, आखिर बेटा किसका है? माँ भाव विभोर होकर मुझसे लिपट गईं और उन्होंने तुरंत सवा पांच रुपये प्रसाद को दिए. भाई-बहन मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं दूसरे ग्रह से उतरा हूं. मैंने एक दर्जन खाली रजिस्टरों की फरमाईश करी, जो पिता जी अगले दिन ही दफ्तर से उठा लाए. रजिस्टरों पर सुंदर कवर चढ़ाए गए और रंग-बिरंगे पेनों से उन पर सब्जेक्ट, इंडेक्स, पेज नंबर वगैरा लिखे गए.

    उधर माता जी, पिता जी ने दूध वाले से एक किलो दूध और बढ़ा दिया था, क्योंकि अब दिमाग की कसरत चालू हो रही थी. कुश्ती हो या आईएएस, दूध की खपत कॉमन है. धोबी, दुकानदार, सब्जीवाले, डाकिये आदि सबको ऑफिशियली बता दिया गया था कि हमारा रवि आईएएस दे रहा है, वे जरा उसके कपड़ों पर अच्छी इस्त्री किया करें. बेहतर सौदा दें, हरी सब्जियां दें, चिट्ठी जरा जल्दी लाया करें, बार-बार कॉल बेल न बजाया करें, बच्चे को डिस्टर्ब होता है, रिश्तेदारों में सभी को लिस्ट बनाकर खबर करा दी गई थी, ताकि कोई छूट न जाए. पिता जी को एक साथ पचास लिफाफे डॉक में डालने जाता देख एक दिन मैंने पूछा तो माता जी ने पुलकित होकर बताया कि अपने दोस्तों को, रिश्तेदारों को, और कुछ उन रिश्तेदारों को, जो अपने आगे हमें कुछ समझते ही न थे, और हमारे घर झांकते भी न थे, को खबर की गई है कि हमारा लड़का आईएएस दे रहा है. इसलिए दिल्ली आकार उसका ध्यान न बंटाएं.

    मैंने अपने छोटे भाई को ताकीद कर दी थी कि आईएएस का विज्ञापन आने पर मुझे इत्तिला कर दे, कारण कि एक तो मुझे अपनी राजभाषा से इतना प्रेम है कि अंग्रेजी के अखबार में मैं सिवाय फोटो के और कुछ ज्यादा देखना-पढ़ना पसंद नहीं करता हूं. दूसरे मैं तो तैयारी में वैसे भी इतना व्यस्त हो जाऊंगा कि मुझे दीन-दुनिया की फिर खबर कहां होगी. ऐसा सुना है कि मैच फिक्सिंग से पहले दिमागी कंसंट्रेशन के लिए क्रिकेटर च्युइंगम चबाते थे. मैंने भी ट्राई की, मगर कोई मजा नहीं आया. फिर किसी ने मुझे समझाया, आईएएस का क्रिकेटरों से क्या मुकाबला, ये सब तो दसवीं फेल या ड्रॉप आउट टाइप होते हैं. बस मीडिया और मॉडर्न बेवकूफ लड़कियों के चलते ये स्टार बन जाते हैं. उस दिन से मैंने क्रिकेट मैच देखना भी बंद कर दिया, हालांकि मुझे बहुत पसंद था.

    जर्दे वाला पान और पान मसाले पर बात ठहरी. मैंने दोनों का खूब सेवन करना शुरू कर दिया. रात-बिरात में अपने पिता जी को भी पान लाने भेज देता. मुझे भला फुर्सत कहां, जिंदगी और मौत का सवाल था. मेरी माँ रात में उठ-उठकर मुझे चाय बना के पिलाती. घर में सभी दबे पांव चलते, धीमी आवाज में बात करते. कुछ सस्ती किस्म की फिल्मी पत्रिकाएं, जिनको पढ़ने पर पिता जी ने कई बार मेरी ठुकाई की थी, अब नियमित आने लगीं थीं. उसके दो कारण थे, एक तो आईएएस वालों का कोई भरोसा नहीं कहां से क्या पूछ लें. दूसरे, बेहद पढ़ाई के बाद लाइट रीडिंग भी मस्तिष्क के लिए जरूरी है, ये बात पिता जी अपने ऑफिस में कहीं सुनकर आए थे.

    अब मेरी फरमाईश की चीजें घर पर बनने लगीं थीं. माँ पूछतीं, बेटे आज क्या खाने को मन कर रहा है. मैंने जी भरकर अपनी मनपसंद भिंडी खाई और बाकी घर वालों की नाक में दम कर दिया. घर में दूध, दही, मक्खन, फल, पान-मसाला, बॉर्नवीटा, च्यवनप्राश, बादाम आदि सब पर्याप्त रूप से स्टॉक कर दिए गए थे और ताला लगा दिया गया था, जिसकी एक चाबी मेरे पास और एक माता जी के पास थी. माताजी दूध की सारी मलाई निकालकर मेरे लिए रख देतीं. मेरे भाई-बहन टापते रह जाते. थोड़े दिनों में उन्हें आदत हो गई और किसी के गिलास में अगर गलती से भी मलाई चली जाती, तो वह माता जी को रिफंड कर देता. चैन की छन रही थी. कल तक का नाकारा, नालायक, जिसके भविष्य के बारे में पिता जी आश्वस्त थे कि यह जूता पॉलिश करेगा या सायकल का पंक्चर लगायेगा, वह वीआईपी हो गया था. साला मैं तो साहब बन गया!

    और फिर जिसका डर था वही बात हो गई. आईएएस का विज्ञापन निकल गया. मेरा छोटा भाई, जिसे मैंने सिर्फ विज्ञापन देखने की ड्यूटी दी थी, वह जोश-जोश में फॉर्म भी ले आया. फॉर्म पढ़कर मुझे चक्कर आने लगे. फॉर्म समझ में नहीं आता था. जितना पढ़ता उतना ही कन्फ्यूज हो जाता. कहने को फॉर्म द्विभाषी था, मगर इसकी हिंदी कौन अंग्रेजी से कम थी. कहां से लाते हैं ये हिंदी के शब्द, ये कौन प्रदेश की भाषा है जी. जो अंग्रेजी से भी अधिक कठिन है.

    जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो इंसान ईश्वर की शरण में जाता है. मैंने भी माता-पिता को अपना फैसला सुना दिया कि मैं फॉर्म भरने से पहले माता के दर्शन करना चाहता हूं. सब गदगद हो गए. अब किस में दम है कि मना करे और पाप का भागीदार बने. बस फिर क्या था, हम सब दोस्त-यार पिकनिक कम दर्शन पर निकल पड़े. बड़ा मजा आया. माता जी ने हाथ खोलकर पैसे दिए थे. इसके बाद तो जब मेरा मन उचटता, मैं कहता, ‘माता के जाना है, माता ने बुलाया है’. बस दूसरे दिन रवानगी हो जाती.

    जैसे-तैसे फॉर्म भरने के बाद मेरी ऐश का दूसरा फेज चालू हुआ. मैंने दिखाने को अब तो एक पुरानी जनरल नॉलेज की किताब भी खरीद ली थी. बाकी विषयों के लिए मैंने कह दिया था आईएएस की किताबें कोई खेल-खिलौना या मखौल नहीं हती हैं. अव्वल तो मिलती ही नहीं हैं, मिलती हैं तो बहुत महंगी. अतः मैं उन्हें लाइब्रेरी में जाकर ही पढूंगा. माता-पिता फिर निहाल हो गए कि मुझे उनका और उनके खर्चे का कितना ख्याल है. सबको बताते फिरते कि रवि जी लाइब्रेरी गए हैं. कलेक्टर साब को इज्जत से बुलाना चाहिए. फिर अगर घर वाले ही इज्जत नहीं करेंगे, तो बाहर वाले क्या खाक करेंगे.

    रोज शाम को मित्र लोगों की टोली निकल पड़ती, कभी फिल्म, कभी मटरगश्ती, कभी इश्क, बड़ा मजा आ रहा था. मैं सोचता था जिस सर्विस की तैयारी में ही इतना मजा है, सर्विस मिलने का बाद क्या होगा? हमारे घर में पहले ही कोई आता-जाता न था, अब तो खबर और करा दी गई थी. साथ ही माता-पिता जब भी पास-पड़ोस या किसी समारोह में जाते, तो कोई मेरे लिए पूछता या न पूछता, वे सबको सुनाते हुए यह कहना नहीं भूलते, “जरा जल्दी जाना है, रवि जी को आईएएस की पढ़ाई करता छोड़ आए हैं. रवि जी तो लाइब्रेरी गए हैं आईएएस के सिलसिले में..”

    हमारा एक दोस्त मेरठ के पास रहता था. उसका वहां फॉर्म हाउस था. उसने बताया कि वहां ऐशो-आराम की सभी सुविधाएं हैं. बस मैंने घर वालों से कह दिया कि मैं मेरठ सेंटर से फॉर्म भरूंगा, कारण कि सरकार ने डिसाइड किया है कि मेरठ से आईएएस बहुत कम हैं इसलिए अब की बार मेरठ सेंटर से लोगों को ज्यादा से ज्यादा लेना है. मेरे माता-पिता तो यह सुनकर ही खुशी से पागल हो गए और उन्होंने अपने एक परिचित के यहां मेरठ में मेरा इंतजाम कर दिया.

    वह परिचित बड़े ही धार्मिक और वेजिटेरियन थे. मेरा मन मुर्गा खाने को कर रहा था. मैंने तुरंत माता-पिता को दिल्ली फोन लगाया और उनकी शिकायत कर दी, जैसे वेजिटेरियन न हों कोई कच्छा-बनियान गिरोह वाले हों. सुनते ही मेरे बड़े भाई दिल्ली से स्कूटर पर पका-पकाया मुर्गा मुझे मेरठ देने आ गए. वे नहीं चाहते थे कि इम्तहान से ठीक पहले मेरा मन चिकन जैसी टुच्ची चीज के चलते विचलित हो जाए. कुछ वो ये भी नहीं चाहते थे कि मैं कैसे भी अपने फेल होने का इल्जाम उनके या मुर्गे के सर लगा पाऊं. इतना बड़ा इल्जाम लेकर वो नरक में न जाना चाहते थे.

    एक बार क्लर्की के इम्तहान में अपने फेल होने का इल्जाम मैं बिजली पर लगाया आया था और साफ बच निकला था. क्या करता, बिजली नहीं थी, बिजली नहीं थी, तो लिफ्ट नहीं चल रही थी, लिफ्ट नहीं चल रही थी, तो मैं टाइपराईटर सीढ़ियों से उठाए-उठाए सेकेंड फ्लोर पर ले गया. बस बांह जाम हो गई, हाथ अकड गए. उंगलियां सुन्न पड़ गयीं, टाइप कर ही नहीं पाया, और मैं क्या कोई भी नहीं कर पाया..

    राम-राम करके इम्तहान का दिन भी आ गया. सुबह-सुबह फ्रेश होकर मैं स्कूटर पर इम्तहान देने निकला. स्कूटर मैंने बड़े भैया से, जब मुर्गा देने आए थे, तो झटक लिया था. मन बिल्कुल शांत और साफ था. कोई तैयारी नहीं थी. कुछ याद किया ही न था, जिसे भूलने की टेंशन होती. प्रीलिमनरी इम्तहान की एक और विशेषता है, न तो वे प्रश्न पत्र आपको देते हैं, ताकि कोई बाद में आपसे पूछकर क्रॉस चेक ना कर पाए. (जब मैंने दिया था तब ऐसा ही था.. आजकल देने लगे हैं). दूसरे, सारे सवाल ऑब्जेक्टिव टाइप होते हैं. बस राईट का निशान लगाते जाओ. दिमाग पर कोई जोर नहीं पड़ता. दरअसल सवाल पढ़ने की जहमत किए बिना ही मैं राईट का निशान जहां-तहां लगाकर निकल आया. सवाल पढ़कर ही कौन सा तीर मार लेना था.

    अपना रिजल्ट तो बखूबी मालूम था. फिर भी माता-पिता को घर जाकर “मैं कैसे मरते-मरते बचा..” की कहानी पूरे इफेक्ट के साथ सुना दी. “मैं सेंटर जा रहा था, स्कूटर मैं बहुत ठीक-ठीक और धीरे-धीरे चला रहा था कि अचानक एक बुढ़िया सड़क के बीचों-बीच न जाने कहां से आकर खड़ी हो गई, लाख बचाते-बचाते भी मेरे स्कूटर से टकरा गई, मैं गिर गया, बुढ़िया गायब हो गई, अब तुम्हीं बताओ मम्मी ऐसी मनोदशा में मैं कितना नर्वस हो गया, इम्तहान क्या खाक देता, फिर भी दे आया हूं, पर्चा अच्छा हुआ है, देखिए क्या होता है, रिजल्ट तो साल के आखिर में आएगा, लेकिन मेन की तैयारी तो अभी से करनी है..”

    माता जी मेरी कहानी सुनकर रुआंसी हो उठीं और उन्होंने मुझे गोद में छुपा लिया. उस बुढ़िया को हजार-हजार बार कोसते हुए वे मेरे लिए हल्दी मिला दूध लेने चलीं गईं. मुझे यह डर था कि कोई यह न टोक दे कि भैया ‘नॉलिज’ क्या डोलची में दूध की तरह ले जा रहे थे, जो कि बुढ़िया के टकराने से सड़क पर फैल गई. मगर हमारी कहानी के आगे बड़े-बड़े भूतनाथ फेल हैं.

    अब मैं सोच रहा हूं कि अगली बार इल्जाम किस पर डालूं.. बिजली.. बुढ़िया.. बारिश.. बॉलीवुड... अभी तो जेड तक बाकी है.

    *लेखक सेवानिवृत्त आईआरपीएस अधिकारी और सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं.

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