सबके लिए उपयोगी: ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’

    ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक डॉ. दिनेश प्रताप सिंह मध्य रेलवे, मुंबई मंडल में आरक्षण पर्यवेक्षक हैं. रेलवे में कार्य करते हुए उन्होंने बाईस पुस्तकों की रचना, अनुवाद, संपादन किया है. वे केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) नई दिल्ली में परामर्शदाता हैं. उनके शोध विषय ‘कोरकू जनजाति का लोक साहित्य’ पर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने उन्हें ‘सीनियर फेलोशिप’ प्रदान की है. - संपादक


    किसी समाज में भाषा अथवा बोली का प्रयोग शुरू होने के काफी समय बाद उसके व्याकरण की रचना होती है. भाषा मूलतः व्याकरण की आश्रित नहीं होती, किन्तु व्याकरण के माध्यम से संस्कारित होकर वह बोली और लिखी जाती है. व्याकरण में भाषा के इन्हीं नियमों को सिद्धांत रूप में प्रस्तुत किया जाता है. किसी भाषा के व्याकरण में उस भाषा की संरचना पर प्रकाश डाला जाता है. व्याकरण के सही ज्ञान से भाषा के विशेष साहित्य का अर्थ आसानी से समझा जा सकता है. सार रूप में कहा जाए तो - ‘किसी भी भाषा के आधार के रूप में उसके व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है. व्याकरण भाषा की वह नींव है, जिस पर उसका सुसज्ज भवन खड़ा होता है.’

    हिन्दी की उत्पत्ति और विकास बोलियों से हुआ है. इसे वर्तमान स्वरूप में लाने में संस्कृत के व्याकरण की बड़ी भूमिका है. आगे चलकर हिन्दी के आचार्यों ने व्याकरण की रचना की. इस दिशा में पहला प्रयास आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया. उनके कार्य को रामचन्द्र वर्मा, आचार्य किशोरीदास बाजपेयी, डॉ. भोलानाथ तिवारी, भगीरथ मिश्र इत्यादि ने नई दिशा और गति प्रदान की. वर्तमान समय में हिन्दी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को देखते हुए व्याकरण की एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता जान पड़ रही थी, जो हिन्दी और गैर-हिन्दी भाषी लेखकों तथा पाठकों को व्यावहारिक ज्ञान दे सके.

    इसी विचार को ध्यान में रखकर डॉ. दिनेश प्रताप सिंह ने ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’ ग्रन्थ की रचना की है. इस विषय में उनका कहना है-

    ‘यह बार-बार अनुभव होता है कि देश के विभिन्न भागों में हिन्दी के पढ़ने-लिखने के प्रति लोगों में इच्छाशक्ति बढ़ रही है. किन्तु उनके सामने अनेक कठिनाईयां उत्पन्न होती हैं. सबसे प्रमुख है शुद्धता के प्रति उनकी झिझक. यह झिझक हिन्दी के व्याकरण के विषय में उनके ज्ञान को लेकर है. उन्हें सरल भाषा और व्यवहारिक रूप में हिन्दी के व्याकरण की जरूरत हमेशा महसूस होती है. उनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए इस ग्रंथ की रचना की गयी है.’

    ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’ ग्रन्थ में विषयवस्तु का निर्धारण विद्यार्थियों, नवलेखकों और पाठकों को ध्यान में रखकर किया गया है. शब्द-भेद और शब्द-संपदा पूरी तरह से विद्यार्थियों के लिए है. शब्द-भेद के अंतर्गत विकारी शब्द-संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया तथा शब्द-विकार के कारण- लिंग, वचन, कारक हैं, तो साथ में अविकारी शब्द अर्थात अव्यय भी शामिल है. शब्द-संपदा में उपसर्ग, प्रत्यय, समास, सन्धि समाहित हैं. यह भाग चालीस पृष्ठों में है. आगे की विषयवस्तु- वाक्य, काल, अशुद्ध शोधन, वर्तनी विचार, विराम चिन्ह, पर्यायों में अर्थभेद, पर्यायवाची, विलोम शब्द, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, रस, छन्द, अलंकार, सार लेखन, भाव विस्तार, निबंध लेखन, पत्र लेखन विद्यार्थियों के साथ ही सामान्य पाठकों और लेखकों के लिए भी उपयोगी है. इन सबको इस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है कि गैर-हिन्दी भाषी लेखक-पाठक भी हिन्दी को भली-भांति समझ, लिख और बोल सकें. अशुद्धियों की पहचान और उन्हें दूर करने हेतु विस्तृत मार्गदर्शन इस पुस्तक में किया गया है. इस प्रकार हिन्दी भाषा का अध्ययन करने वालों को व्याकरण के व्यावहारिक पक्ष को समझाने और आवश्यक सामग्री सुलभ कराने का पूरा प्रयास किया गया है.

    डॉ. दिनेश प्रताप सिंह का हिन्दी के व्याकरण के क्षेत्र में किया गया यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह ग्रंथ हर दृष्टि से पठनीय और संग्रहणीय है. इस ग्रंथ की उत्कृष्टता और उपयोगिता का आंकलन करके केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने इसके प्रकाशन हेतु आर्थिक साहयोग प्रदान किया है, ताकि कम मूल्य में यह ग्रंथ सबको उपलब्ध हो सके.

    ‘हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण’
    पृष्ठ संख्या : 200
    आकार : डिमाई
    मूल्य : पुस्तकालय संस्करण - 350 रुपए
          :  विद्यार्थी संस्करण - 200 रुपए

    प्रकाशक :
    प्रारब्ध प्रकाशन
    185, मम्फोर्ड गंज,
    इलाहाबाद-211002.

    समीक्षक :
    डॉ. उमाशंकर पाल
    प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,
    एल. डी. सोनावणे महाविद्यालय,
    कल्याण, ठाणे-421301.

सम्पादकीय