व्यंग्य : रिटायरमेंट की उम्र 100 बरस हो गई!

    रवीन्द्र कुमार*

    बहुत दिनों से न्यूज पेपर और टी. वी. में न्यूज आ रही है. अब न्यूज है, पेड न्यूज है या कि बस कोरी अफवाह है, यह वह लोग जानें, मगर न्यूज यह है कि सरकार रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा रही है. 60 वर्ष से 62 वर्ष कर देगी. कोई कोई कह रहा है कि 65 वर्ष होने वाली है. जहां तक मुझे याद पड़ता है, रिटायरमेंट की उम्र पहले 55 बरस थी. फिर 58 हुई और उसके बाद 60 वर्ष हो गई. सच तो यह है कि आदमी को किसी भी उमर में रिटायर किया जा सकता है. आप पहले आंकड़ा तय कर लें, तर्क फिर उसी प्रकार के ढूंढे जा सकते हैं. बाकी सब तो लफ्फाजी है.

    आयु जो भी आप डिसाइड करें, बड़े-बड़े धुरंधर बैठे हैं, जो हजार दो हजार पेज की रपट उठते-बैठते चुटकियों में बना देंगे. हमारे सरकारी दफ्तरों में ये कहावत है कि आप डिसाइड तो करो क्या करना है, अंग्रेजी तो वैसे ही बन जाएगी.ऐसे ही चुनाव से पहले की एक शाम सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 100 वर्ष कर दी और तर्क दिया कि भारत ऋषि-मुनियों की धरती है, हमारे यहां च्यवनप्राश और वियाग्रा के संगम से जो पीढ़ी पैदा हुई है, वो 100 बरस से ऊपर जीने वाली है, तो क्यों न उनकी प्रोडक्टिविटी का उपयोग राष्ट्र निर्माण में किया जाए.

    राष्ट्र निर्माण के नाम पर तरह-तरह के विध्वंस आप दिल खोलकर कर सकते हैं. कोई कुछ नहीं कहेगा. उल्टे हो सकता है आप पदमश्री जैसा कुछ झटकने में कामयाब हो जाएं. आखिर उम्र क्या है? है क्या ये उम्र? सिर्फ एक नंबर. महज एक आंकड़ा. जैसे गरीबी एक ‘स्टेट ऑफ माइंड’ है, उसी तरह बूढ़ा होना भी एक स्टेट ऑफ माइंड है. आप उस स्टेट ऑफ माइंड से बाहर निकलिए. फिर देखिए, एक बार निकल कर तो आईए, आप आए दिन अखबारों में डर्टी ओल्ड मैंनों के किस्से सुनते-पढ़ते रहते हैं. ज्यादा कहना उचित नहीं.

    सरकारी दफ्तरों में काम होता कब है. आपने केस उलझाना ही तो है. आपके मुंह में कुछ जुमले फिट होने चाहिए, जैसे इम्प्लांट करवा लिए हों. जैसे कि ‘यह नहीं हो सकता’, ‘कल आईए’, ‘परसों आईए’, ‘ट्रिपलीकेट में लाईए’, ‘आज बाबू छुट्टी पर है’, 'आज डीलिंग बबुआइन चाइल्ड केयर पर हैं', इत्यादि. उनका लड़का 17 का हो गया है, 18 का होते ही चाइल्ड केयर मिलती नहीं, सो अभी से सेंत ली है.

    दफ्तर में 100 बरस तक काम करने के लिए मुंह में दांत, सर पर बाल और पेट में आंत चाहिए, ये कहां लिखा है? भारतीय नौकरशाही एक बहुत बड़ा सफेद हाथी है. इसे यह वरदान प्राप्त है कि ये हाथी दिन-दूनी रात आठ-गुनी रफ्तार से आकार में बढ़ रहा है. दफ्तरों में जाकर देखें, लोग बारी-बारी से बैठते हैं. जब तक एक बैठता है, तब तक दूसरा लॉन में ताश खेलता है. या फिर चाय पी-पीकर पॉलिटिक्स पर चर्चा करता है. बेचारे और करें भी क्या?

    इस स्टेज और एज तक आते-आते वो अपने घरवालों के लिए एक विलासिता की वस्तु बन जाते हैं, जिसे घरवाले एफोर्ड नहीं करना चाहते हैं. पुराने मॉडल की कार के माफिक जो शोर बहुत करती है और खाली-पीली दर-रोज मेंटिनेंस भी भारी मांगती है. बाबू लोगों के साथ आजकल कुछ मर्ज़ तो रविवार-शनिवार के सफिक्स की तरह जुड़ गए हैं. जैसे बी. पी., हार्ट, किडनी, कैटरेक्ट, कहां तक गिनाऊं. कभी-कभी लगता है कि ऑफिस की केंटीन के साथ ही अस्पताल की सुविधा होनी चाहिए, जहां गठिया-बाई के तेल मालिश से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक का पूरा-पूरा इंतजाम हो.

    लोग-बाग खासकर बड़े अधिकारी जो लाल बत्ती वाली कारों में ऑफिस आने-जाने के आदी हैं, मैंने उनके लिए भी उपाय सोच लिया है, अब वो लाल बत्ती वाली गाड़ी की जगह लाल बत्ती वाली एम्बूलेंस से ऑफिस आया-जाया करेंगे. इससे उनका रुतबा भी बना रहेगा और स्पेशल मेडिकल अटेंशन भी मिलती रहेगी.

    आजकल दफ्तरों में सैक्सुअल हैरेसमेंट के केसों को देखते हुए मैं सोच रहा था कि रिटायरमेंट की उम्र 100 बरस होने से किस-किस तरह के केस आया करेंगे. मसलन एक 88 साल के दादा जी पर 86 साला दादीनुमा भद्र महिला आरोप लगाएगी कि ये बुड्डा मुझे देखकर सीटी बजाता है और खांसता है. दादा जी सफाई में अपने एक छोड़ के एक टूटे हुए दांतों की श्रंखला दिखाएंगे कि कैसे बत्तीसी जो अब महज सत्ती रह गयी है, इसलिए इनमें से हवा अपने आप निकल जाती है और लोग सोचते हैं वे सीटी बजा रहे थे. वे अपनी पुरानी खांसी के पुराने नुस्खे दिखाएंगे, “जी मैं तो 65 साल की उम्र से खांस रहा हूं, इसका तभी से इलाज भी चल रहा है. डॉक्टर के सार्टिफिकेट देख लो.” और इस तरह दादा जी बाल-बाल बाइज्जत बरी हो पाएंगे.

    आप लोगों ने इलेक्शन के समय मतदान के दिन एक फोटो जरूर देखा होगा, जिसमें किसी एक बेहद बूढ़े व्यक्ति को पीठ पर लादकर वोट डालने को लाया जाता है. बस ऐसा ही कुछ नजारा रोज सुबह-शाम हर दफ्तर, हर मंत्रालय के बाहर रहा करेगा. घर से दफ्तर, दफ्तर से घर. घरवाले भी चुपचाप सहेंगे, ये सोचकर कि कमाऊ बुढऊ है. इससे वृद्धों के प्रति समाज का रवैया बदलेगा. ओल्ड एज होम नहीं बनेंगे. वे सम्मान के साथ अपने-अपने संयुक्त परिवार में रह सकेंगे. इससे उनके हार्ड कौर और यो यो हनी सिंह को अपना फॉस्टर पेरेंट्स समझने वाले नाती-पोतों को अपने दादा-दादी की गाइडेंस सतत मिलती रहेगी, जिससे नई पीढ़ी में संस्कारों का उदय होगा.

    बड़े-बूढ़ों को घर पर अक्सर पसंद नहीं किया जाता. अत: मुंह अंधेरे ही वे ऑफिस आ जाया करेंगे. रात को नींद तो उन्हें वैसे भी नहीं आती. तो सोचो मुमकिन है बहुत से बूढ़े तो घर ही न जाएं. ये सोच कर कि कौन ये रोज-रोज आने-जाने की किल्लत मोल ले. अत: वो ऑफिस की बेंच पर ही अपने-अपने आशियां बना लेंगे. जैसे मुंबई के टैक्सी वाले. वे टैक्सी में ही रहते, सोते-खाते हैं. सोचो, इससे मैन-पॉवर सदैव उपलब्ध रहेगी. और उत्पादकता का ग्राफ कहां से कहां पहुंच जाएगा. बूढ़ों को आप फिजूल न समझें, न उनको ये कह कर चिढ़ायें कि वे चले हुए कारतूस हैं. सोच-समझकर बोलना बच्चू, अब वो दिन दूर नहीं, जब आप क्या, आपके पिताजी भी दादा जी से जेब खर्च लेने लाइन में खड़े होंगे.

    * रवीन्द्र कुमार, भारतीय रेल के सेवानिवृत्त आईआपीएस अधिकारी और चर्चित व्यंग्यकार हैं.

सम्पादकीय