अथ नकल महिमा !

    व्यंग्य : डॉ. नागेन्द्र पति त्रिपाठी

    नकल कब, कैसे और कहां शुरू हुई, इसका ज्ञान मुझे नहीं था. इसके उद्भव और विकास का हाल जानने के लिए हाड़तोड़ मेहनत किया. बड़ी-बड़ी लाईब्रेरियों की धूल फांकी. विद्वानों से पूछा. अभिलेखागारों में मजनू बनकर भटका. नामी-गिरामी लोगों से नकल के बारे में उनके सारगर्भित अनुभव पूछे. सालों के गहन अनुसंधान के बाद जो दुर्लभ ज्ञान मुझे हासिल हुआ, वह यह है कि हम हिन्दुस्तानी नकल के विश्व गुरू हैं, संसार को यह दुर्लभ व बहुमूल्य ज्ञान हिन्दुस्तान ने ही निःशुल्क दिया है. इस तरह नकल के क्षेत्र में हिंदुस्तान के योगदान पर पड़ी यवनिका को हटाकर मैं एक महान देशभक्ति का काम करने जा रहा हूं.

    नकल के बारे में मैंने जो अनुसंधान में पाया वह यह था कि नकल की महान तकनीक के जन्मदाता हम ही हैं. जब दुनिया अज्ञान और असभ्यता के अंधकार में डूबी हुई थी, तब हमारे अंदर नकल की अकल  आ गई थी. हम नकल की नई-नई प्रविधियां एवं तकनीकें विकसित करने लगे थे. नकल की दुनिया में हमारा योगदान पूर्णतः मौलिक और अद्वितीय है. हमारे देश की यह महान ज्ञान परंपरा अब तक हिंदुस्तान की बदकिस्मती से सरकारी दफ्तरों की क्लासीफाइड फाइलों की तरह बंद पड़ी थी, जिसका नाड़ा खोलने का महान काम मैं करने जा रहा हूं.

    भारत माता का सच्चा बेटा होने के नाते मेरा यह जातीय फर्ज है कि भारतीय ज्ञान की इस महान परंपरा का पूरी दुनिया में घूम-घूमकर प्रचार करूं. जिस तरह विवेका बाबा ने पूरी दुनिया में भारत की धर्म विजय का डंका पीटा, मैं भी संसार में भारत के नकल शास्त्र का झंडा फहराऊंगा. जिस तरह लोग भारतीय खाने, योग, वैदिक गणित, आयुर्वेद, देह-मालिश और अध्यात्म का डंका पीट-पीटकर देश की प्रसिध्दी में छौंक लगा रहे हैं, ठीक उसी तरह मैं नकल जैसे सबके लिए उपयोगी और दो अंकों की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने वाले आईटम की मौलिक उपलब्धियों से दुनिया को परिचित कराना चाहता हूं.

    मैं अग्र-सोची हूं. मेरी आँखें टाइम मशीन बन के समय के अनंत विस्तार में आगे देख रही हैं. लोग बाग बोलते रहते हैं जमाना ज्ञान आधारित उद्योगों का है. बात सोलह आने सही भी है. अतः इसके लाभों से आम जनता को परिचित कराने के लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाने की जरूरत है. इसके लिए किसी धुरंधर नकलची को ब्रांड अम्बेसडर बनाया जाना चाहिए. नकल देश को शिक्षा और साक्षरता के मामले में छलांग लगवा सकती है. नकल हमारे लिए विदेशी मुद्रा का भंडार सिद्ध हो सकती है. यह हमारी अर्थव्यवस्था की मशीन के लिए अरब देशों का तेल हो सकती है. नकल में रोजगार के नए अवसर सृजित करने की असीम संभावनाएं हैं. इसलिए हमें नकल को तुरंत एक उद्योग का दर्जा देना चाहिए.

    इस उद्योग में जल्दी से फलने-फूलने-फैलने की असीम संभावनाएं हैं. जिस तरह आज भारत सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में पूरी दुनिया को हिला रहा है, जल्द ही नकल के क्षेत्र में उसकी तूती बोलेगी. भारत के नकल एक्सपर्ट पूरी दुनिया को चराएंगे. उनकी मौलिकता, प्रतिभा और सृजनशीलता की दुनिया के नकल के बाजार में भारी डिमांड होगी. हमारे नकल एक्सपर्ट हमारी आर्थिक ताकत साबित होगें. विदेशियों के नकल भंडार में चूना लगाने का महत्वपूर्ण जरिया.

    आने वाले दिनों में सारी दुनिया अपनी परीक्षाओं की आउटसोर्सिंग भारत से कराएगी, जहां पहले से ही अचूक और मारक क्षमता वाले नकल विशेषज्ञों की एक पूरी जमात सर्वोत्तम विश्वस्तरीय सेवाएं प्रतियोगी कीमतों पर देने के लिए पहले से ही हाजिर है. हमारे नकल विशेषज्ञों ने हजारों सालों की लंबी परंपरा और साधना से प्राप्त ज्ञान और सालों के गंभीर, गहन और सतत अनुसंधान और नवोन्मेष से नकल की अचूक तकनीकें विकसित की हैं. इनका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं. हमें अपनी नकल तकनीकों का यथाशीघ्र पेटेंट करवाना होगा, वरना नीम और हल्दी की तरह अमेरीकी इसे भी ले उड़ेंगे.

    नकल से संबन्धित हमारा ज्ञान हमारी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए मास्टर प्लान बनाया जाना चाहिए. नकल से संबन्धित अपनी पूरी जानकारी और प्रक्रियाओं को हमें विदेशियों की गिध्द-दृष्टि से बचाकर रखना होगा. हमें अपने नकल ज्ञान की सुरक्षा के खास उपाय करने होगें. खासकर अपने पड़ोसी से अपने नकल ज्ञान को बचाने की ज्यादा जरूरत है, क्योंकि नकल के मामले में वह भी हमारी ही तरह उस्ताद है. इसका कारण भी है. हमारा सहोदर जो ठहरा. गर्भ में ही नकल सीख कर पैदा हुआ है. नकल टीपकर एटम बम बना लिया और अब एटम बम का एक्सपोर्टर बन गया है. सिबलिंग राइवलरी हमसे रखता है. जब न तब एटम बम हमारी ओर तान देता है. वैसे नकल टीपकर बनाई गई हर चीज का इस्तेमाल वह भारत के खिलाफ करता है, इसलिए पाकिस्तान बबुआ से हमें ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है. हमारे ज्ञानी लोग बताते हैं कि जर्मन हमारे वेदों को चुराकर राजा बन गए. जर्मनों ने सारी तकनीक वेदों से चुरा ली. मांगने पर डुप्लीकेट वेद थमा देते हैं. असली वेदों को दबाकर बैठ गए हैं.

    हमारे नकल विशेषज्ञों ने अपनी मेहनत से नकल की अचूक, सुविधाजनक, मारक, सरल एवं यूजर फ्रेंडली तकनीकें विकसित की हैं. प्रोडक्ट और आइडियाज़ की नकल, नकल सामग्री के निर्माण, नकल सामग्री के परीक्षा स्थल तक परिवहन, परीक्षा कक्ष में इसे सुरक्षित रखने, इससे नकल टीपने, परीक्षार्थी बदलने, कॉपियां बदलने, पेपर आउट कराने, चिट पहुंचाने, इलेक्ट्रॉनिक नकल आदि के लिए कई नायाब विधियां एवं तकनीकें विकसित की हैं. परंतु यह ज्ञान बिखरा पड़ा है. आज देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे नकल विशेषज्ञों को एक मंच पर लाए जाने की जरूरत है. उनके द्वारा विकसित की गई दुर्लभ तकनीकों को संहिताबद्ध किए जाने की जरूरत है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी नकल की हमारी महान विरासत का लाभ उठा सकें. इसके साथ ही विभिन्न नकल विशेषज्ञों द्वारा विकसित की गईं नकल प्रविधियों को समन्वित कर प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि ये सर्वसुलभ हो सकें. ऐसा होने पर नकल जैसी उपयोगी तकनीक से रंजीत डॉन जैसे एकाधिकारवादियों का वर्चस्व टूट जाएगा. इससे नकल सर्वसुलभ होगी, सस्ती होगी, जनता के आर्थिक दायरे में होगी. इससे नकल का लाभ आम लोगों तक पहुंचेगा.

    दुनिया के मेले में अपने नकल की महिमा और धाक बढ़ाने के लिए हमें अपनी नकल को सस्ता, टिकाऊ और प्रतियोगी बनाना होगा. तात्पर्य यह है कि हमारी नकल खूबसूरत, सस्ती और टिकाऊ हो. यानि टाटा के सामानों की तरह एकदम झकास क्वालिटी वाली. दुनिया के मेले में टिके रहने के लिए हमें अपनी नकल तकनीकों में लगातार उन्नयन करते रहना होगा, क्योंकि हमारा उत्तरी पड़ोसी इस मामले में भी हमें तगड़ी टक्कर देगा.

    नकल के भारतीय तौर-तरीके दुनिया के तमाम देशों के लिए काफी फायदेमंद साबित होंगे. इनकी सहायता से लोग बिना हील-हुज्जत के, बिना किसी मेहनत के पढ़ लिख सकेंगे. असली तकनीक का मतलब भी तो यही है, जो आम लोगों को लाभ पहुंचाए. जो सस्ती, टिकाऊ और सर्वसुलभ हो. हमारी नकल की तकनीकें इस कसौटी पर चौबीस कैरेट सोने की तरह खरी उतरती हैं. ये पूरी दुनिया के लिए लाभकारी और उपयोगी हैं. इन तकनीकों के कारण लोगों को स्कूल नहीं जाना पड़ेगा. बिना स्कूल गए भी लोग परीक्षा पास कर लेंगे. कोई भला आदमी बिना परीक्षा दिए भी पढ़ना चाहता है, तो उसका भी काम नहीं रुकेगा. उसकी परीक्षा कोई दूसरा दे देगा. वो पास हो जाएगा. यदि परीक्षा देनी भी पड़े, तो नकल की अचूक तकनीकें, जैसे घर से ही कॉपी लिखकर ले आने की तकनीक, परीक्षा से पहले ही पेपर जान लेने की तकनीक, परीक्षा का भवसागर पार करा देंगी.

    रिसर्च के मामले में तो हमारी नकल विशेषज्ञता और भी अचूक और टिकाऊ है. हमारे नकल एक्सपर्ट दुनिया में सबसे कम रेट पर निष्कर्ष सहित उच्च कोटि के विश्व-स्तरीय शोध प्रबंध घर बैठे ही उपलब्ध करा देते हैं. इनकी कृपा से दुनिया में रिसर्च करना काफी सस्ता, सरल और सहज हो गया है. इस तरह हमारी नकल तकनीकें पूरी दुनिया में शिक्षा के सर्वजननिकरण के रास्ते को चौड़ा करने वाली हैं. नकल तकनीकों के कारण आकड़ों की दुनिया में साक्षरों की संख्या बढ़ जाएगी, शिक्षितों के नंबर में भारी इजाफ़ा हो जाएगा और पूरी दुनिया रिसर्च स्कालरों से पट जाएगी. इस तरह पूरी दुनिया बिना मेहनत किए पढ़ी-लिखी हो जाएगी. यही तो तकनीक का कमाल है. इंसान के जीवन को आसान बनाना. हमारे नकल एक्सपर्टों ने यह कमाल कर दिखाया. एक ऐसा चमत्कार जो इस दुनिया में पहले कभी नहीं हुआ. हमारे नकलचियों ने अपनी प्रतिभा से इस असंभव को संभव कर दिखाया है.

    हमें अपनी नकल की ध्वजा को पूरी दुनिया में फहराना है. इसलिए इनके परचार-परसार की जरूरत है. भारतीय नकल पध्दति के गुण गाने वाली प्रदर्शनियां हमें विदेशों में लगानी चाहिए. विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों को नकल के क्षेत्र में भारतीय मौलिकता को प्रतिस्थापित करने के लिए विशेष भारतीय नकल प्रकोष्ठों की स्थापना करनी चाहिए. कृष्णगृह में गहन साधना मे लगे हमारे महान और हुनरमंद नकल एक्सपर्टों को ब्रांड अम्बेसडर बनाकर विदेशों में घूमाना चाहिए. भारतीय शिक्षण संस्थाओं को नकल की अपनी यूएसपी पर केन्द्रित एक जबर्दस्त कॅम्पेन विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए चलाना चाहिए. मोदी जी के मार्केटिंग राज में समय आ गया है कि नकल के क्षेत्र में भारत की महारत की दुनिया में जबर्दस्त मार्केटिंग की जाए. जिस तरह भारतीय सॉफ्टवेयर पर आज पूरी दुनिया लट्टू है, आने वाले दिनों में नैक्ल्वेयर पर होगी. नकल भारत के भविष्य की ऊर्जा है. हमारे आने वाले दिनों की कामधेनु गाय. इसलिए इसकी गाय माता की ही तरह पूजा होनी चाहिए. हमारा कल्याण एवं विकास इसी में निहित है.

सम्पादकीय