उच्च जातियों में ऊंचा क्या है?? संविधान जवाब दे !!

    सुरेश त्रिपाठी

    पिछले कुछ वर्षों अथवा जब से असंगत आरक्षण के खिलाफ और आर्थिक तौर पर समाज के सभी वर्गों को आरक्षण दिए जाने तथा आरक्षण की पिछले 70 वर्षों से चली आ रही वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की मांग उठने लगी है, तब से यह देखने में आ रहा है कि जब भी कोई सवर्ण या उच्च वर्ग का व्यक्ति वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के बारे में कोई बात सोशल मीडिया पर कहता है और इस पर अपना विचार या मत प्रकट करता है, वैसे ही कथित दलित वर्ग के लोग एकदम से उसके विरुद्ध प्रलाप करते हुए ‘जाति’ को खत्म करने की बात करने लगते हैं.

    उनकी इस कथित ‘जाति’ रूपी तर्क के पीछे एक बहुत सोची-समझी रणनीति है. उनका मानना है कि जैसे ही वह जाति को खत्म करने की बात कहेंगे, वैसे ही सवर्ण वर्ग या उच्च जातियों के लोग संकुचित हो जाएंगे और उच्च वर्ग के पास उनके इस कुतर्क को काटने का कोई तर्क नहीं होगा. हो भी यही रहा है. वह न सिर्फ खुलकर, बल्कि बहुत आक्रामक होकर समाज से जाति को खत्म करने की बात कर रहे हैं. यहां तक कि गाली-गलौज पर उतर रहे हैं. इसके अलावा इससे भी आगे बढ़कर वह यह भी कह रहे हैं कि क्या ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर अपनी लड़कियों की शादी उनके लडकों के साथ करने को तैयार हैं. यह ऐसे तर्क हैं, जिनका कोई माकूल जवाब देते नहीं बन रहा है.

    यह सही है कि जाति व्यवस्था टूटी है. शहरों और महानगरों में अब जाति का कोई नामो-निशान नहीं बचा है. कोई भी व्यक्ति होटल में यह नहीं देख रहा है कि जिस गिलास में उसने पानी पिया, जिस प्लेट अथवा थाली में उसने खाना खाया है, उसमें उससे पहले किसने पानी पिया, किसने खाना खाया. दफ्तरों में भी एक ही टेबल पर सभी वर्ग के अधिकारी और कर्मचारी भी साथ बैठकर खाना खा रहे हैं और एक ही गिलास में पानी भी पी रहे हैं. दूर-दराज गावों-कस्बों में हो सकता है कि अभी-भी जाति का कुछ नामो-निशान बचा हो, मगर वहां भी अब कोई यह नहीं कह सकता है कि किसी निम्न वर्ग के व्यक्ति की छाया उस पर पड़ गई है, इसलिए अब उसे पुनः स्नान करना पड़ेगा. अब गावों-कस्बों में भी खानपान की बुफे व्यवस्था पूरे जोर-शोर से चल पड़ी है. अब वहां भी एक ही टेबल से सभी वर्ग के लोग खाना लेकर खा रहे हैं और एक ही जगह से पानी पी रहे हैं. यह भी एक सच्चाई है.

    तथापि, वर्तमान त्रुटिपूर्ण आरक्षण व्यवस्था को सदियों तक जारी नहीं रखा जा सकता है. यह भी सर्वज्ञात है कि भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान सिर्फ दस साल के लिए ही किया गया था. यह ठीक है कि दस साल इसके लिए पर्याप्त नहीं माने गए, परंतु राजनीतिक स्वार्थवश इस व्यवस्था को अनंत काल तक जारी नहीं रखा जा सकता. अब समय आ गया है कि इसकी उचित समीक्षा की जाए और यदि फिर भी आरक्षण दिए जाने की जरूरत महसूस होती है, तो यह आर्थिक आधार पर होना चाहिए, जिसमें समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए. यही न्याय-संगत होगा.

    यहां यह भी ध्यान देने की जरुरत है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के चलते तथाकथित निम्न वर्ग, जो कि दलित नहीं हैं और न ही कहीं भी दलित शब्द का उल्लेख आया है, में एक ‘एलीट’ वर्ग का उद्भव हो चुका है. यह एलीट वर्ग किसी भी स्थिति में आरक्षण का लाभ छोड़ना नहीं चाहता है. इस वर्ग में हजारों-लाखों लोग वह भी शामिल हैं, जिनकी चार-पांच पीढ़ियां आरक्षण का लाभ ले चुकी हैं और यह लोग अब किसी भी कथित उच्च वर्ग से कई गुना ज्यादा सक्षम और संपन्न हो चुके हैं. यह अपने वर्ग के उन लोगों के लिए भी आरक्षण का लाभ आज भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, जिन्हें वास्तव में आज तक आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया है.

    सरकारी क्षेत्र में आरक्षण और आरक्षण के भीतर आरक्षण यानि गैर-कानूनी रूप से पदोन्नतियों में आरक्षण के चलते चारों तरफ इसी नव-एलीट वर्ग का आधिपत्य हो चुका है. सरकारी कामकाज की गुणवत्ता में आज जो भारी गिरावट आ रही है, उसका कारण यही है कि कुछ अपवादों को छोड़कर यह नव-एलीट वर्ग न तो काम करना चाहता है, न ही इसे काम करना आता है, और न ही इसे काम करने का अनुभव है, क्योंकि इसमें काम करने और अनुभव लेने की लालसा ही नहीं है. काम तो अब भी वही उच्च वर्ग कर रहा है, जिसे यह नव-एलीट वर्ग धकेलकर हासिए पर करता जा रहा है. इसके चलते उच्च वर्ग के बच्चों और सवर्ण सरकारी कर्मचारियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति पैदा हो रही है. अतः सभी सवर्ण जातियों को वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होने और इसका डटकर विरोध करने का समय आ गया है.

    सवाल यह उठता है कि सवर्णों को किस आधार पर ऊंची जाति वाला कहकर सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. आज के दौर में ऐसा क्या है कि ब्राह्मण जाति में जो ऊंचा है, सरकारों को ये भी खुलासा करना चाहिए. जबकि ब्राह्मण अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं. अगर पूजा-पाठ करना, पांचांग पढ़ना, हवन करवाना उनके पौराणिक अध्यवसाय के कारण ब्राह्मण को सवर्ण जाति का कहा जाता है, तो मैं बताना चाहता हूं आजकल मंदिर के तमाम पुरोहित मंदिर कमेटी के आधीन नौकरी करते हैं, जिन्हें बहुत ही थोड़ी मात्रा में वेतन पर रखा जाता है. उन्हें मंदिर-कमेटी के सदस्यों अथवा ट्रस्ट के दबाव में रहना पड़ता है. अब तो पुजारियों को भद्दी-भद्दी गालियां भी पड़ने लगी हैं. फिर क्यों ब्राह्मण को सरकारी नौकरी में, सरकारी स्कूल में और सरकारी योजनाओं में किसी प्रकार की छूट नहीं दी जाती? क्या सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह पैदाइसी तौर पर सवर्ण या ब्राह्मण है?

    ब्राह्मणों या सवर्णों की नई पीढ़ी को किसी प्रकार के पदोन्नति, साक्षात्कार अथवा परीक्षा में कोई रियायत नहीं मिलती, तो वह अपने पूर्वजों को कोसते हुए कहते हैं कि क्या भारतीय संविधान ने मुगलों के जुल्म सहने का यही इनाम दिया है? मुगलों द्वारा जब ब्राह्मणों को काटा जाता था, वेद-पुराण आदि धर्म-ग्रंथों को जलाया जाता था, तो यह ब्राह्मण ही था, जिसे वेद-पुराण कंठस्थ थे और वह जुल्म सहन करते हुए भी छुप-छुपकर अपनी संतानों को मंत्र-हवन, क्रियाकर्म और मुंडन-अन्न प्रासन की विधि, गृह प्रवेश, भूमि पूजन इत्यादि सिखाता रहता था, ताकि अपने देश की संस्कृति जिंदा रह सके और धर्म को बचा लिया, जबकि एक हजार वर्ष मुगलों और दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों के जुल्म के बावजूद यह ब्राह्मण ही था, जिसने भारतीयों को हिन्दू बनाए रखा और आज इसी देश में उन्हीं ब्राह्मणों को कदम-दर-कदम अपमान सहन करना पड़ रहा है.

    हम ब्राह्मण या सवर्ण सरकार से कोई विशेष सम्मान नही चाहते, और न ही हमें आरक्षण की बैसाखी चाहिए, परंतु कम से कम सरकारी योजनाओं या निजी कार्य में हमें बराबरी मिलनी ही चाहिए. ये कैसी उच्च जाति व्यवस्था है कि उच्च कहकर हमें प्रताड़ित किया जा रहा है. हमने या हमारे बच्चों ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया, जिसके लिए हमें नया अछूत बनाया जा रहा है. पहली बात यह कि यदि पुरातन काल में हमारे पूर्वजों ने किसी प्रकार की ज्यादती अथवा अत्याचार किन्हीं कथित निम्न जातियों के प्रति किया था, तो उसकी सजा हमें या हमारे बच्चों को क्यों मिलनी चाहिए? दूसरी बात यह है कि वर्तमान में हमारे या सामान्य वर्ग अथवा कथित सवर्ण जातियों के प्रति जो भेदभाव किया जा रहा है, क्या वह उसी इतिहास को दोहराने जैसा नहीं है?

    भारतीय संविधान अथवा निहितस्वार्थी सरकारें केवल इतना स्पष्ट करें कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में ऊंचा क्या है और किस आधार पर है? इस व्यवस्था ने हमें मजबूर कर दिया है कि हम ब्राह्मण, हिन्दू समाज को एकजुट करें और इस व्यवस्था को खत्म करने का संकल्प लें.

सम्पादकीय