श्रेष्ठता एवं सतत प्रगति ही हमारा मूल मन्त्र होना चाहिए

    अशोक शर्मा

    हम आप सभी जानते हैं कि भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था कर्म पर ही आधारित थी. कर्म के अनुसार ही यह समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र चार वर्णों में विभक्त था. यहां यह समझना आवश्यक है कि इस बारे में वेद क्या कहते हैं.

    शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
    क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्या द्वैश्यात्तथैव च।

    अर्थात, श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ कर्मों के अनुसार शूद्र - ब्राह्मण और ब्राह्मण - शूद्र हो जाता है. जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के गुणों वाला हो, वह उसी वर्ण का हो जाता है.

    सनातन धर्म को कमजोर करके अपना वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से विगत में कई शासकों ने हिंदुओं को आपस में लड़ाकर तोड़ना शुरू कर दिया था. आज भी हिन्दू एकता से भयभीत कुछ राजनितिक दलों ने हिन्दू वोट को तोड़ने के लिए उन्हें आपस में जाति के नाम पर विभक्त कर रखा है. हिन्दू मानस अपने धर्म-कर्म के अनुसार अथवा सनातन से ही अत्यंत सहिष्णु और सहनशील रहा है. इसे उसकी अनमनस्कता समझकर इसका लाभ समय-समय पर उसे जाति-वर्ण में बांटकर और उसकी भावनाओं को भड़काकर उठाया जाता रहा है. हमें इस षड्यंत्र को समझना होगा और षड्यंत्रकारियों से सावधान रहना होगा.

    वर्तमान में कथित दलित समुदाय, जो कि हिन्दू धर्म का ही अभिन्न अंग है, के कुछ नासमझ लोग ‘रामचरित मानस’ की किसी चौपाई या वेद-पुराण के किसी श्लोक का गलत अर्थ प्रस्तुत करके हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं. वह गलत तात्पर्य प्रस्तुत करके यह दिखाने में लगे हैं कि सदियों से दलितों के साथ कैसा व्यवहार होता था. जबकि उसी युग में एक मछुआरन की संतान वेदव्यास ने महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की थी और त्रेता युग में पिछड़ी जाति के वाल्मीकि ने संस्कृत में ‘रामायण’ जैसे युगांतरकारी ग्रंथ की रचना की.

    एक दलित महिला हिडिम्बा के पोते खाटू श्याम को आज भी भगवान की तरह पूजा जाता है. भगवान् श्रीराम ने एक दलित महिला शबरी के जूठे बेर खाये थे, वहीं श्रीराम ने एक दलित केवट को गले लगाया था.

    न्याय–अन्याय हर युग में होते रहे हैं, वर्तमान में भी हो रहे हैं, और आगे होते रहेंगे, अहंकार भी टकराएंगे. यह घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण होती हैं, परंतु इनको जातिगत रंग देकर उस पर विभाजन की राजनीति करके राष्ट्र को कमजोर करना उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है.

    यदि किसी ने भीमराव आंबेडकर का अपमान किया था, तो एक सवर्ण ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव ने ही उनको पढ़ाया भी था और उनकी समस्त पढ़ाई का खर्च वड़ोदरा के राजा गायकवाड़ ने उठाया था. किसी एक घटना को अपने स्वार्थ के लिए बार-बार उछालना दलित चिंतन नहीं, बल्कि विश्व में अल्पसंख्यक हिन्दू समाज को खत्म करने के अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र के तहत केवल विधर्म प्रेरित राष्ट्रद्रोहियों का चिंतन ही कहा जाएगा, जो कि आज के अधिकांश तथाकथित दलित समाज को अपने आगोश में ले चुका है.

    कोई व्यक्ति या इंसान गरीब हो सकता है, लेकिन दलित नहीं. तथाकथित दलित युवाओं को आरक्षण का लालच देकर उनके मन में सवर्णों या सामान्य वर्ग के लिए नफरत का जो बीज बोया जा रहा है, वह सामान्य वर्ग के युवाओं को उनके योग्य अवसरों से वंचित कर रहा है. एक तरफ उन्हें बेरोजगारी एवं गरीबी की तरफ धकेला जा रहा है, तो दूसरी तरफ देश को अक्षम और कमजोर हाथों में सौंपकर राष्ट्र के विकास के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.

    सामान्य वर्ग के युवाओं और खासतौर पर हमारे ब्राह्मण युवकों को इस षड्यंत्र को समझने की जरूरत तथा स्वयं को सशक्त बनाने की आवश्यकता है. आरक्षण नीति से प्रेरणा लें कि बैसाखी के सहारे व्यक्ति चल तो सकता है, लेकिन दौड़ नहीं सकता. आपके पास संसाधन हैं, अवसर भी हैं, जरुरत है अपने परिश्रम का सही समय पर सही अनुपात में उपयोग करने की, ताकि स्वयं को सदैव शिखर पर स्थापित कर सकें. संपूर्ण ब्राह्मण समुदाय को गर्व है कि हम जनसंख्या प्रतिशत में कम होकर भी श्रेष्ठता एवं सफलता के शिखर पर हैं. इस प्रवाह को हमारी आने वाली पीढ़ियां अनवरत बनाए रखते हुए नए आयाम देंगी और सफलता का परचम सदैव सर्वोच्च रहेगा, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है.

सम्पादकीय