हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग : वाकई गंभीर पहल या भाजपाई राष्ट्रवाद का शगूफा?

    जब इस संस्थान के बच्चे ‘अभियंता’ बनकर निकलेंगे, तो इनका भविष्य क्या होगा?

    यह सवाल इसलिए भी पूछे जाने चाहिए, क्योंकि इस कोर्स को शुरू करने वाले भोपाल के हिंदी विश्वविद्यालय का ध्यान कुछ नया करने के बजाय, अनुवाद किए हुए पाठ्यक्रम पर ज्यादा है

    प्रेमपाल शर्मा

    मध्य प्रदेश के अटलबिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय (एबीवीएचवी) को शुरू हुए अभी सिर्फ चार साल (शुरुआत दिसंबर 2011) ही हुए हैं. लेकिन बीते पिछले कुछ समय से लग रहा है, जैसे यह युवा हो गया हो, क्योंकि इसने उस क्षेत्र में पैर फंसाने का जोखिम लिया है, जिसकी कोशिश किसी नए-नवेले संस्थान ने तो क्या, अब तक शायद देश के किसी पुराने संस्थान ने भी नहीं की है. शिक्षा सत्र 2012-13 से महज 60 छात्र-छात्राओं के साथ शुरू हुए एबीवीएचवी ने सितंबर 2016 से हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू किया है. संस्थान के इस क्षेत्र में कदम रखते ही देश भर में इससे जुड़ी तमाम अपेक्षाओं-आशंकाओं पर भी बहस शुरू हो गई है.

    एबीवीएचवी में 18 संकायों के 200 से अधिक पाठ्यक्रमों में करीब 4,000 बच्चे पंजीकृत हैं. ऐसा संस्थान की वेबसाइट का दावा है. लेकिन सुर्खियों में इन दिनों इनमें से सिर्फ एक पाठ्यक्रम और तीन बच्चे हैं. ये वे हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालय में शुरू हुए हिंदी माध्यम के अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है. वैसे, विश्वविद्यालय प्रबंधन की मानें तो दाखिला सात बच्चों ने लिया है. लेकिन कक्षाओं में आने वाले अभी सिर्फ तीन (बंशीधर सिंह, ऋषभ सिंह और चंदन बैरागी) ही हैं. पहले सेमेस्टर में पढ़ने और पढ़ाने वाले भी तीन-तीन ही हैं. पाठ्यक्रम में शाखाएं (ब्रांच) भी तीन ही हैं, नागर (सिविल), वैद्युत (इलेक्ट्रिकल) और यांत्रिक (मैकेनिकल). जबकि इन शाखाओं में सीटें 90 हैं.

    इस पृष्ठभूमि के साथ ये भी याद रखना होगा कि यह विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार की पसंदीदा प्रायोगिक परियोजनाओं में से एक है. इसके लिए राज्य सरकार हर साल करीब पांच करोड़ रुपए की मदद भी देती है. प्रायोगिक इसलिए क्योंकि जिन-जिन राज्यों में भाजपा की सरकार लंबे समय से हैं, उनमें गुजरात, छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश भी है. इन राज्यों को भाजपा के मातृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रयोग-स्थल समझा जाने लगा है. संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में राष्ट्रभाषा हिंदी का बहुतायत प्रयोग एक अहम घटक है. हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग को लेकर शुरू हुए सुर्ख विवाद की जड़ यहीं है.

    हिंदी बनाम अंग्रेजी की बहस

    एबीवीएचवी की पहल के साथ जो सबसे पहली बहस शुरू हुई है, वह हिंदी बनाम अंग्रेजी की है. इस संबंध में भोपाल के मौलाना आजाद राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान (मैनिट) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर योगेंद्र कुमार दलील देते हैँ, ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य हो चुकी है. ऐसे में जो छात्र हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग करेंगे, वे जीवन में सफल कैसे होंगे. उन्हें तो दोबारा से पूरी तकनीकी शब्दावली अंग्रेजी में सीखनी होगी.’ पुणे की एक नई-नवेली कंपनी (स्टार्ट अप) के सह-संस्थापक और गूगल में छह साल काम कर चुके पुणे के राहुल कुलकर्णी भी इससे इत्तेफाक रखते हैं. उनके मुताबिक, ‘भारतीय इंजीनियरों के साथ सबसे बड़ी समस्या अंग्रेजी में संवाद कौशल (कम्युनिकेशन स्किल) की है. फिर वे चाहे छोटी जगहों से पढ़कर निकलें या फिर बड़े नामी संस्थानों से.’

    ‘नेशनल स्पोकन इंग्लिश स्किल्स ऑफ इंजीनियर्स रिपोर्ट’ भी यही कहती है. इसके मुताबिक, ‘सिर्फ 7.1% भारतीय इंजीनियर्स ही ऐसे हैं, साक्षात्कार के दौरान जिनकी अंग्रेजी समझने लायक और अर्थपूर्ण होती है. जबकि 67% ऐसे हैं, जो अंग्रेजी न तो लिख सकते हैं, न बोल सकते हैं और न ही पढ़ सकते हैं. लगभग 61% इंजीनियर तो ऐसे होते हैं, जो सातवें दर्जे की अंग्रेजी का व्याकरण भी नहीं जानते. यह सिर्फ छोटे शहरों से इंजीनियरिंग करने वालों की स्थिति है, ऐसा भी नहीं है. आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) और एनआईटी (राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान) से पढ़कर निकलने वालों का भी यही हाल है. यह रिपोर्ट अगस्त 2015 में आई थी. ‘एस्पायरिंग माइंड्स’ नाम की संस्था ने इसे तैयार करने के लिए देश भर के 500 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेजों के 30,000 से ज्यादा बच्चों की क्षमता आंकी थी.

    यानि कि इस रिपोर्ट और विशेषज्ञों की बात का मतलब सिर्फ ये है कि तेजी से सिकुड़ती दुनिया में कारोबार-रोजगार के लिए अंग्रेजी बहुत जरूरी है. लेकिन एबीवीएचवी के लोग ऐसा नहीं मानते. संस्थान के लिए हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम तैयार करने में जुटे एक वरिष्ठ प्रोफेसर पूछते हैं, ‘अंग्रेजी से पढ़कर निकलने वाले इंजीनियर अपने मातहत कामगारों से क्या अंग्रेजी में बात करते हैं? उस वक्त तो उन्हें संवाद के लिए स्थानीय भाषा ही सीखनी पड़ती है, फिर चाहे वह किसी भी देश-प्रदेश की हो.’ एक अन्य प्रोफेसर सवाल दागते हैं, ‘इजराइल, जर्मनी, चीन, जापान, जैसे कई देशों में इंजीनियरिंग हो या मेडिकल साइंस, सब स्थानीय भाषा में पढ़ाई जाती है. तो क्या इन देशों के लोग किसी भी क्षेत्र में पीछे हैं? बल्कि ये देश तो तकनीक के क्षेत्र में दुनिया की बड़ी ताकत हैं. वहां अंग्रेजी की ऐसी जरूरत महसूस क्यों नहीं होती?’

    शब्दावली की व्यावहारिकता के मसले पर विवाद

    इंजीनियरिंग के लिए एबीवीएचवी अभी पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया में ही है, लेकिन तकनीकी शब्दावली के हिंदीकरण की व्यावहारिकता पर सवाल उठने लगे हैं. हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, ‘कोई इंजीनियर अगर स्वत: लब्धि नियंत्रण (ऑटोमेटिक गेन कंट्रोल), असम्मित बंकन (अनसिमेट्रिकल बेंडिंग), पराविद्युत सामर्थ्य (डाइलेक्ट्रिक स्ट्रेंग्थ), प्रतिवर्ति दोलन (रिफ्लेक्स ऑस्किलेशन), योजक बहुसंकेतक (एड मल्टीप्लेक्सर) जैसे शब्दों का इस्तेमाल करे, तो क्या इन्हें समझना किसी के लिए भी आसान होगा.’ इसका जवाब देते हैं, भोपाल के सुभाष एक्सिलेंस स्कूल के भौतिक विज्ञान के वरिष्ठ शिक्षक गुलाब सिंह. उनके मुताबिक, ‘हिंदी माध्यम के छात्रों को अंग्रेजी की तकनीकी शब्दावली से समस्या नहीं है. उन्हें इस शब्दावली की व्याख्या अंग्रेजी में किए जाने से दिक्कत ज्यादा है, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि चलन में तो अंग्रेजी की शब्दावली ही है. ऐसे में तकनीकी शब्दावली का हिंदीकरण छात्रों के लिए नई समस्या खड़ी कर सकता है.’

    लेकिन एबीवीएचवी प्रबंधन इस पर भी सवाल ही खड़े करता है. सत्याग्रह से बातचीत में कुलपति मोहनलाल छीपा पूछते हैं, ‘अंग्रेजी की शब्दावली चलन में कैसे आई?’ तुरंत जवाब भी देते हैं, ‘पहले 200 साल अंग्रेजों की और फिर आजादी के 70 साल बाद तक अंग्रेजियत की गुलामी से. इस गुलाम मानसिकता को दूर करने की जरूरत है. हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं. हम समृद्ध प्राचीन भारतीय ज्ञान और परम्पराओं को स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं. इसीलिए हमने इंजीनियरिंग के पहले सेमेस्टर से ही एक विषय ‘भारतीय ज्ञान और परम्परा' का भी रखा है. मगर हम यह भी जानते हैं कि यह मुश्किल काम है. हमें अच्छी तरह पता है कि हम धारा के खिलाफ जा रहे हैं. इसीलिए अंग्रेजियत का गुलाम हो चुका देश का एक बड़ा वर्ग हमारा विरोध भी करेगा ही. पर हमें इसकी ज्यादा परवाह नहीं है. हिंदी को स्थापित करने में कुछ वक्त तो लगेगा, लेकिन एक बार इसकी शब्दावली चलन में आ गई, तो सबके लिए सहज हो जाएगी.’

    रोजगार के लायक पाठ्यक्रम की चिंता

    बीते छह महीने से एबीवीएचवी की तीन सदस्यों की समिति इंजीनियरिंग का हिंदी पाठ्यक्रम तैयार करने में लगी है. जैसा कि एक वरिष्ठ प्रोफेसर बताते हैं, ‘पूरा पाठ्यक्रम अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के दिशा-निर्देश के हिसाब से ही तैयार किया जा रहा है.’ यानी यह पाठ्यक्रम कमोबेश वही है, जिसे देश के करीब 6,214 इंजीनियरिंग एवं तकनीकी महाविद्यालयों में हर साल भर्ती होने वाले लगभग 29 लाख बच्चे अंग्रेजी में पढ़ते हैं. एक पत्रिका में प्रकाशित मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इन आंकड़ों के मुताबिक, हर साल इनमें से 15 लाख बच्चे इंजीनियरिंग की डिग्री के साथ नौकरी ढूंढने वालों की कतार में शामिल हो जाते हैं, और नौकरी है कि मिलती नहीं. क्यों? इसकी वजह बताती है जनवरी 2016 में आई ‘नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट फॉर इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स’.

    एस्पायरिंग माइंड्स ने ही देश के 520 कॉलेजों से इंजीनियरिंग कर चुके 1.2 लाख बच्चों की परीक्षा लेकर यह रिपोर्ट तैयार की थी. इसके मुताबिक, देश के 96.5% इंजीनियरिंग ग्रेजुएट इस लायक भी नहीं होते कि उन्हें नौकरी शुरू करते ही कोई काम सौंपा जा सके. वहीं, 92.51% इंजीनियर इंजीनियरिंग के मुख्य कामों (सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक) के लायक नहीं होते. यानी इन्हें पहले तैयार करना पड़ता है. तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने वाली संस्था जेटकिंग इन्फ्रोट्रेन के उपाध्यक्ष सिद्धार्थ भरवानी के मुताबिक, ‘इसकी वजह ये है कि पाठ्यक्रम समय के साथ अपडेट नहीं होता. जैसे, मोबाइल कंप्यूटिंग आज के दौर का चलन है. इसमें तकनीकी क्षेत्र को विशेषज्ञ कामगार चाहिए, लेकिन यह विषय पाठ्यक्रम में अब तक नहीं है.’

    यानी एबीवीएचवी जिस पाठ्यक्रम को अपना रहा है, वह अंग्रेजी माध्यम से ही युवाओं को रोजगार दिलाने में नाकाम है, तो हिंदी माध्यम से सफल कैसे होगा?. लेकिन कुलपति मोहनलाल छीपा इस आशंका को भी खारिज कर देते हैं. बल्कि वे तो यह भी दावा करते हैं, ‘मेरे बच्चे किसी से नौकरी मांगने जाएंगे ही नहीं. वे दूसरों को नौकरी देंगे और यह हम सुनिश्चित करेंगे.’ पर यह होगा कैसे? यह भी एक यक्ष-प्रश्न है, क्योंकि संस्थान के इंजीनियरिंग विभाग के पास न जरूरी संख्या में शिक्षक हैं, न अध्ययन सामग्री और न ही कोई प्रयोगशाला. आधारभूत ढांचा तो पूरे संस्थान के पास ही नहीं है. यहां तक कि प्रदेश की पुरानी विधानसभा के जिस परिसर में अस्थायी तौर पर विश्वविद्यालय चल रहा है, वह भी उससे कभी भी छिन सकता है, क्योंकि राज्य सरकार यहां एक आलीशान होटल बनवाने जा रही है.

    अंत में, एस्पायरिंग माइंड्स की रिपोर्ट ही बताती है कि इंजीनियरिंग करने वाले 53% बच्चे सॉफ्टवेयर क्षेत्र तथा 44% इंजीनियरिंग की मुख्य शाखाओं में नौकरी ही करना चाहते हैं. एबीवीएचवी में अभियांत्रिकी के पहले बैच में दाखिला लेने वाले बच्चे भी इस 97% से अलग नहीं हैं. इनमें ही शामिल बंशीधर और ऋषभ कहते हैं, ‘हमारी पढ़ाई का माध्यम हिंदी रहा है. हम इसी माध्यम से इंजीनियरिंग करना चाहते थे, जो अब कर पा रहे हैं. हमें नहीं लगता कि हम में से किसी को भी इसकी वजह से नौकरी हासिल करने में कोई दिक्कत होगी.’
    तमाम आशंकाओं के बीच यही वह अपेक्षा है, जो डराती है कि चार साल बाद जब इस संस्थान के बच्चे ‘अभियंता’ बनकर निकलेंगे तो इनका भविष्य क्या होगा? क्योंकि भाजपा और संघ को तो अपने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के प्रयोग के लिए कोई अन्य संसाधन मिल जाएंगे, मगर तब तक इन बच्चों का साध्य और साधन सब अंधेरे में खो चुका होगा.

सम्पादकीय