प्राइम टाइम इंट्रो : क्या पत्रकारों की विश्वसनीयता कठघरे में है !!

    अमेरिका में मीडिया को लेकर जो हो रहा है, वह भारत में भी होना चाहिए !

    ‘पत्रकार को चमचा होने की ज़रूरत नहीं है. उसे संदेहवादी होना चाहिए. मतलब वह सरकार के हर दावे को संदेह की निगाह से देखे.’ यह बात अमेरिका के हाल ही में भूतपूर्व हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कही है. पद छोड़ने से 48 घंटे पहले ओबामा ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए अंग्रेज़ी में इस वाक्य को कुछ तरह से कहा, "You are not supposed to be sycophants, you are supposed to be skeptics."

    हिंदी में 'संदेहवादी' ही उचित शब्द है, मगर यह शब्द 'प्रश्नवादी' ज्यादा बेहतर लगता है. पत्रकार को प्रश्नवादी होना चाहिए. ओबामा के इस कथन के ढ़ाई महीना पहले सुदूर भारत में भी ठीक यही बात अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संपादक राजकमल झा ने भारत के प्रधानमंत्री के सामने कही थी. उनके सामने कहे जाने से इस बात का वजन थोड़ा अधिक हो जाता है, क्योंकि उन्होंने सत्ता के शिखर पुरुष के सामने सवाल पूछने के अपने अधिकार को दोहराया था.

    ओबामा कह रहे हैं कि अमेरिका को पत्रकारों की जरूरत है. लोकतंत्र को पत्रकारों की जरूरत है. नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मीडिया से इस तरह पेश आ रहे हैं जैसे उसका काम सिर्फ उनके कथनों को टाइप करना है, प्रश्न करना नहीं. अमेरिका में प्रेस के संवैधानिक अधिकार भारत से कहीं ज्यादा और बेहतर हैं. हालांकि अमेरिकी मीडिया को लेकर कोई आदर्श या स्वर्ण युग टाइप धारणा नहीं रखनी चाहिए. उनकी भी कमियां रही हैं. भारत में भी सामान्य लोग खूब पूछते हैं कि मीडिया सरकार से डर गया है, क्या सरकार मीडिया को डरा रही है, क्या पत्रकार बिक गया है, फलां चमचा है, पत्रकारों को इस बात के लिए भी निशाना बनाया जाता है कि वह सरकार से सवाल क्यों करता है?

    उल्लेखनीय है कि आठ साल के कार्यकाल में ओबामा की 165वीं प्रेस कांफ्रेंस थी. इसे उनके आठ साल के कार्यकाल से भाग दिया जाए, तो ओबामा ने हर साल 20 प्रेस कांफ्रेंस की हैं. परंतु ढ़ाई साल से ज्यादा हो गए, भारत के प्रधानमंत्री ने एक भी औपचारिक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है. अलबत्ता उन्होंने कुछ चैनलों और अखबारों को विस्तार से इंटरव्यू जरूर दिया है. ढ़ाई साल में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई ओपन प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है. जबकि जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने आठ साल में 210 प्रेस कांफ्रेंस की थीं और बिल क्लिंटन ने आठ साल में 193 प्रेस कांफ्रेंस की थीं. लेकिन सामान्य दर्शक या पाठक इसे दिल्ली की सरकार के संदर्भ में न देखें. अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्री के संदर्भ में भी देखें कि कौन है जो खुद को ओपन प्रेस कांफ्रेंस में तमाम प्रश्नों के लिए पेश करता है?

    सारी बहस प्रधानमंत्री को केंद्र में रखकर नहीं होनी चाहिए, इससे अखिलेश यादव से लेकर नीतीश कुमार, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी तक सब सस्ते में छूट जाते हैं. ओबामा ने कहा कि पत्रकारों को कठोर प्रश्न करने चाहिए. यहां सवाल यह है कि उनके कार्यकाल में पत्रकारिता का क्या स्तर था. कैसी आज़ादी थी. प्रेस की स्वतंत्रता की सूची में दुनिया के 180 देशों में अमेरिका का स्थान 41वां हैं. पहले, दूसरे, तीसरे नंबर पर क्रमशः फिनलैंड, नीदरलैंड और न्यूजीलैंड हैं. सीरीया, अफगानिस्तान, इराक को लेकर अमेरिकी मीडिया के प्रोपेगैंडा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ये सब तब हुआ जब ट्रंप सीन में भी नहीं थे.

    अब ट्रंप काल शुरू हो रहा है. ट्रंप ने फेक न्यूज का मसला उठाया है. उस पर आलोचना हो सकती है, मगर फेक न्यूज एक हकीकत है, इससे कौन इंकार कर सकता है. जो भी हो, डोनाल्ड ट्रंप प्रेस को लेकर अपनी नापसंद खुलकर जाहिर करते हैं, जैसे भारत में एक मंत्री ने प्रेस को प्रेस्टिट्यूट कहा. सोशल मीडिया पर गाली देने वालों की टोली भी खड़ी की गई है, जो प्रेस की आजादी कम करने का समर्थन करते हैं, राष्ट्रवाद के नाम पर प्रश्नवाद को बेमानी मानते हैं.

    डोनाल्ड ट्रंप के आगमन को लेकर मीडिया अपनी आजादी और भूमिका पर लगातार विचार कर रहा है. हाल ही में अमेरिकी पत्रकारों ने ट्रंप को ही पत्र लिख दिया. यहां पूरा तो नहीं, मगर इसके व्यापक हिस्से का कहीं शाब्दिक तो कहीं भावात्मक अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है. लंबा पत्र है, गौर से पढ़ना पड़ेगा. इस पत्र को तमाम अखबार पहले पन्ने पर छाप दें, तो पत्रकारों के बदलने से पहले पाठकों में बदलाव आ जाएगा, फिर सबकुछ अपने आप बदल जाएगा. अगर पाठकों में से कोई पत्रकारिता का दीवाना है, तो अपने स्तर पर इसका अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद कर इसे बस स्टैंड से लेकर गांव के चौपाल तक पर चिपकाया जाना चाहिए.

    ‘अमेरिकन प्रेस कॉर्प्स’ अमेरिका के पत्रकारों का एक बड़ा संगठन है, जिसका सेंटर न्यूयॉर्क के कोलंबिया युनिवर्सिटी के अंदर है. इसमें हर तरह के न्यूज संगठन और विचारधारा के पत्रकार शामिल हैं. इसी अमेरिकन प्रेस कॉर्प्स ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह पत्र लिखा है. हिंदी में इस पत्र का अनुवाद कुछ इस प्रकार है..

    आदरणीय नव-निवार्चित राष्ट्रपति जी,

    "आपके कार्यकाल के शुरू होने के अंतिम दिनों में हमने अभी ही साफ कर देना सही समझा कि हम आपके प्रशासन और अमेरिकी प्रेस के रिश्तों को कैसे देखते हैं. हम मानते हैं कि दोनों के रिश्तों में तनाव है. रिपोर्ट बताती है कि आपके प्रेस सचिव व्हाइट हाउस से मीडिया के दफ्तरों को बंद करने की सोच रहे हैं. आपने खुद को कवर करने से कई न्यूज संगठनों को बैन किया है. आपने ट्विटर पर नाम लेकर पत्रकारों पर ताने कसे हैं, धमकाया है. अपने समर्थकों को भी ऐसा करने के लिए कहा है. आपने एक रिपोर्टर का यह कहकर मजाक उड़ाया है कि उसकी बातें इसलिए अच्छी नहीं लगीं कि वह विकलांग है.”

    “हमारा संविधान प्रेस की आजादी का संरक्षक है. उसमें कहीं नहीं लिखा है कि राष्ट्रपति कब प्रेस कांफ्रेंस करें और प्रेस का सम्मान करें. प्रेस से संबंध रखने के नियम आपके होंगे. हमारा भी यही अधिकार है, क्योंकि टीवी और अखबार में वो जगह हमारी है, जहां आप प्रभावित करने का प्रयास करेंगे. वहां आप नहीं, हम तय करते हैं कि पाठक, श्रोता या दर्शक के लिए क्या अच्छा रहेगा. आप अपने प्रशासन तक रिपोर्टर की पहुंच समाप्त कर गलती करेंगे. हम सूचना हासिल करने के तरह-तरह के रास्ते खोजने में माहिर हैं. आपने अपने अभियान के दौरान जिन न्यूज संगठनों को बैन किया था उनकी कई रिपोर्ट बेहतरीन रही हैं.”

    “हम आपकी इस चुनौती को स्वीकार करते हैं. पत्रकारिता के नियम हमारे हैं, आपके नहीं. हम चाहें तो आपके अधिकारियों से ऑफ द रिकॉर्ड बात करें या न करें. हम चाहें तो ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग में आएं या न आएं. अगर आप यह सोचते हैं कि रिपोर्टर को चुप करा देने या भगा देने से स्टोरी नहीं मिलेगी, तो आप कतई गलत हैं. हम आपका पक्ष लेने का प्रयास करेंगे, लेकिन हम सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने वालों को जगह नहीं देंगे. वे जब भी ऐसा करेंगे, हम उन्हें भगा देंगे. यह हमारा अधिकार है. हम आपके झूठ को नहीं दोहराएंगे. आपकी बात छापेंगे, लेकिन सच्चाई का पता करेंगे.”

    “आप और आपका स्टाफ व्हाइट हाउस में बैठा रहे, लेकिन अमेरिकी सरकार काफी फैली हुई है. हम सरकार के चारों तरफ अपने रिपोर्टर तैनात कर देंगे. आपकी एजेंसियों में घुसा देंगे और नौकरशाहों से खबरें निकाल लाएंगे. हो सकता है कि आप अपनी प्रशासनिक इमारत से आने वाली खबरों को रोक लें, लेकिन हम आपकी नीतियों की समीक्षा करके दिखा देंगे. हम अपने लिए पहले से कहीं ज्यादा ऊंचे मानक कायम करेंगे. हम आपको इसका श्रेय देते हैं कि आपने मीडिया की गिरती साख को उभारा है. हमारे लिए भी यह जागने का समय है. हमें भी भरोसा हासिल करना होगा. हम इसे सही, साहसिक रिपोर्टिंग से हासिल कर लेंगे. अपनी गलतियों को मानेंगे और पेशेवर नैतिकता का पालन करेंगे.”

    “ज्यादा से ज्यादा आप आठ साल ही राष्ट्रपति के पद पर रह सकते हैं, लेकिन हम तो तब से हैं जब से अमेरिकी गणतंत्र की स्थापना हुई है. इस महान लोकतंत्र में हमारी भूमिका हर दौर में सराही गई है. तलाशी गई है. आपने हमें मजबूर किया है कि हम अपने बारे में फिर से यह बुनियादी सवाल करें कि हम कौन हैं. हम किसलिए यहां हैं. हम आपके आभारी हैं. अपने कार्यकाल के आरंभ का लुत्फ उठाईए." -The American Press Corps

    अमेरिका के पत्रकारों ने दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति को यह पत्र लिखा है. पत्रकारिता का इकबाल बुलंद रहे, इसलिए हमने इस पत्र को अपने पाठकों तक पहुंचाया. अब आगे पाठक स्वयं इसे गांव-गांव तक पहुंचा सकते हैं, क्योंकि यह पत्र भारत के पत्रकार और पाठकों के लिए भी उतना ही जरुरी है, जितना अमेरिकन पाठकों के लिए.

    यहां बीबीसी की एक पहल का उल्लेख करना आवश्यक है. ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के नाम पर मची हाय तौबा के इस दौर में बीबीसी के डायरेक्टर जनरल टोनी हॉल ने 'स्लो न्यूज’ का कंसेप्ट दिया है. स्लो न्यूज का मतलब यह नहीं है कि आज की खबर परसों मिलेगी. यह आज ही मिलेगी, मगर ठीक से जांच परख के बाद. क्योंकि सर्वसामान्य पाठकगण जानते ही हैं कि सोशल मीडिया पर सही खबरों की जगह ‘फेक न्यूज’ का संसार बढ़ता जा रहा है. बीबीसी के डायरेक्टर जनरल ने कहा है कि हम सारा इंटरनेट तो संपादित नहीं कर सकते, मगर किनारे भी नहीं बैठ सकते. इसके लिए बीबीसी के भीतर इंटेलिजेंस यूनिट बनाई जा रही है, जो तमाम फेक न्यूज की तथ्यपरक जांच कर उसका भांडाफोड़ करेगा.

    हम सब जानते हैं कि ज्यादातर फेक न्यूज राजनीतिक संगठनों और उनके समर्थकों द्वारा ही फैलाई जा रही हैं. मीडिया भी फेक न्यूज बनाने में कम नहीं है. भारत में भी न्यूज लांड्री, स्क्रोल डॉट इन, वायर डाट इन, ट्रुथ ऑफ गुजरात जैसी कई वेबसाइट और गाहे-बगाहे चैनलों पर भी इस तरह की कोशिश हो रही है, मगर फिर भी फेक न्यूज का जाल फैलता ही जा रहा है.

    बीबीसी ने इस चुनौती को अभियान के तौर पर स्वीकार किया है. फेसबुक ने भी फेक न्यूज की जांच के लिए टीम बनाने का एलान किया है. बीबीसी की यह बात दिलचस्प है कि पाठकों को स्लो न्यूज की जरूरत है, जिसमें गहराई हो, आंकड़े हों, खोज हो, विश्लेषण हो और विशेषज्ञता हो.

    पाठक चैनलों पर स्पीड न्यूज देखते हैं, दिखने से पहले ही खबर निकल जाती है, सुनाई देने से पहले ही गाड़ी प्लेटफार्म छोड़कर जा चुकी होती है. स्पीड न्यूज के कार्यक्रमों को काफी रेटिंग मिलती है, जिनमें वह सब कुछ नहीं होता, जिसकी बात बीबीसी के डायरेक्टर जनरल कर रहे हैं. अतः अमेरिका में मीडिया को लेकर जो हो रहा है, वह भारत में भी होना चाहिए!

    # सोशल मीडिया के सौजन्य से..

सम्पादकीय