प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक खुला पत्र

    ‘यदि आप सब कुछ नहीं कर सकते, तो आपको कुछ भी नहीं करना चाहिए’

    रेलवे में सुधार के लिए कई समितियां बनी, परंतु जमीनी कार्य कुछ नहीं हुआ

    मोदीजी, बड़ी-बड़ी बातें करते हुए आप जनता को मूर्ख बनाते ही प्रतीत होते हैं

    नामी-गिरामी भ्रष्टों को आपका और आपकी सरकार का संरक्षण प्राप्त रहा है

    भारी व्यभिचार, भ्रष्टाचार और घोटाला फिक्स की हुई क्रिकेट के माध्यम से चल रहा है

    केपीएस और टीएनपीएल जैसी नई-नई लीगों के माध्यम से घोटाला बढ़ता ही जा रहा है

    संस्थागत भ्रष्टाचार से निपटने के लिए दिए गए सुझावों के प्रति सरकार उदासीन रही है

    पंक्तिबद्ध होकर अपने प्राणों का उत्सर्ग कर रहे लोगों के सामने आपका स्वघोषित बलिदान तुच्छ है

    माननीय श्री मोदी जी,

    मैं भारत के उन 125 करोड़ लोगों में से एक हूं, जिनकी आप भारत में और विदेशों में अपने सार्वजनिक भाषणों में सराहना करते रहते हैं. मैं इस पत्र की शुरूआत में ही यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरा किसी राजनीतिक पार्टी के साथ किसी प्रकार का कोई राजनीतिक झुकाव नहीं है.

    सर्वप्रथम मैं अभी हाल ही में आपके द्वारा लिए गए नोटबंदी के साहसिक और ऐतिहासिक विराट फैसले के लिए आपको साधुवाद देता हूं. आपके इस एक फैसले से सर्वथा निराश हो चले विशाल भारत देश में अचानक एक नई आशा का संचार हुआ है. मैं समझ सकता हूं कि इस प्रकार का फैसला लेना एक प्रधानमंत्री होते हुए भी आपके लिए कितना कठिन रहा होगा. 70 साल से इक्कट्ठी हुई भ्रष्टाचार की गंदगी की सफाई की तरफ शायद ही कोई और एक कार्यवाही इतना कारगर हो सकती थी. यद्यपि अनेकों अर्थशास्त्री इस कदम की आलोचना कर रहे हैं.

    मोदी जी, अपको और हम सब को यह समझना होगा कि आपका यह बहुत भारी फैसला भी गहरी जड़ें जमाए हुए भ्रष्टाचार रूपी पेड़ के फलों पर ही प्रहार करता है, जिसकी जड़ें नोटबंदी के इस विराट फैसले के बावजूद जस की तस मजबूत हैं. ये जड़ें आपके ढ़ाई साल के कार्यकाल में और अधिक मजबूत हुई हैं, जिसमें आपका भी यत्किंचित योगदान रहा है. हम सब को समझना होगा कि इन जड़ों को सबसे ज्यादा गहराई और ताकत हमारी बिल्कुल लचर न्याय प्रणाली और व्यवस्था से मिलती है. एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में आपने और आपकी पार्टी ने तो स्वयं अन्याय की एक बेजोड़ मिसाल तब पेश की जब भ्रष्टाचार उजागर करने वाले अपने ही सांसद कीर्ति आजाद को आप लोगों ने पार्टी से निलंबित कर दिया. जिस संस्था और जिस बड़े नेता का भ्रष्टाचार उन्होंने उजागर किया था, उनके विरूद्ध या आपके कार्यकाल में अपने भ्रष्टाचार के लिए चर्चा में आए किसी भी बड़े नेता या उद्योगपति, आपकी पार्टी से जुड़े हों या विपक्ष से जुड़े हों, के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई है.

    मोदी जी, यह सही है कि नोटबंदी के आपके फैसले से एक बड़ी मात्रा में कालाधन नष्ट होगा, परंतु हमको यह भी समझना होगा कि नोटबंदी के कारण बैकों में जमा होने वाला पैसा कालाधन ही नहीं, अपितु लोगों के पास घरों में रखा हुआ निष्क्रिय धन भी है.

    कालेधन पर बनी एसआईटी ने एक वर्ष से अधिक पहले बताया था कि हर वर्ष तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक कालेधन का लेन-देन क्रिकेट में सट्टे के परिणाम स्वरूप होता है. मैं सीधे पत्रों द्वारा पिछले दो वर्षों में बार-बार आपको बता चुका हूं कि किस प्रकार यह बहुत भारी व्यभिचार, भ्रष्टाचार और घोटाला फिक्स की हुई क्रिकेट के माध्यम से चल रहा है, जिसमें सभी खिलाड़ी, क्रिकेट प्रबंधक, क्रिकेट कोच, और अनेकों प्रख्यात लोग, उद्योगपति, मंत्री और राजनीतिज्ञ लिप्त हैं. सब पर उंगली उठाने वाला मीडिया इस महाघोटाले की रीढ़ की हड्डी है और भारत का सर्वोच्च न्यायालय इसका संगरक्षक. यह लिंक आपकी याददाश्त ताजा कर देगा - http://www.diamondbook.in/underworld-cup.html

    इस संस्थागत व्यापक महाघोटाले के प्रति आप नितांत उदासीन रहे हैं, जिसकी जवाबदेही आप पर हमेशा बनी रहेगी. यदि आपने इस विषय में कुछ कार्यवाही की होती, तो भ्रष्टाचार के विशाल पेड़ की जड़ों पर भी एक गहरा प्रहार होता.

    भारतीय पुलिस और मीडिया के अनुसार क्रिकेट के इस महाघोटाले का सीधा लाभ दाऊद इब्राहीम को पहुंचता है. फिर भी आप न केवल इसके प्रति उदासीन रहे हैं, वरन् इसको आपका वरदहस्त भी प्राप्त रहा है. केपीएस और टीएनपीएल जैसी नई--नई टी-20 लीगों के माध्यम से यह महाघोटाला और बढ़ता ही जा रहा है. यदि अब भी आप और आपकी सरकार करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए इस महाघोटाले के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं करेंगे, तो भ्रष्टाचार के मजबूत पेड़ में नए और अधिक रसीले फल लगने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. एक व्यापक स्तर पर भ्रष्ट आचरण बरकरार रहेगा.

    मुझे समझ नहीं आता कि एक महाघोटाले पर तालियां बजाता देश कभी भी महान कैसे हो सकता है? मोदी जी, जहां आप एक ओर दम भरते हैं कि बेईमानों को नहीं छोड़ेंगे, वहीँ दूसरी ओर नामी-गिरामी भ्रष्टों को आपका और आपकी सरकार का संरक्षण प्राप्त रहा है, जिनमें कुछ नाम अरुण जेटली, बंसुधरा राजे सिंधिया, विजय माल्या आदि हैं. अभी हाल ही में आपकी कैबिनेट द्वारा अनुमोदित भ्रष्टाचार विरोधी कानून में बदलाव से नौकरशाही में भ्रष्टाचार को और अधिक बढ़ावा मिलेगा.

    मोदी जी, अभी हाल ही में आपने रेलवे व्यवस्था में सुधार के लिए सूरजकुंड में एक विशाल रेल विकास शिविर का आयोजन करवाया. दुर्भाग्यवश उसी दिन एक बहुत बड़ी रेलवे दुर्घटना हुई, जिसमें करीब डेढ़ सौ भारतवासियों ने दर्दनाक तरीके से प्राण गंवाए और सैंकड़ों घायल हुए. (इसके साथ ही मात्र एक महीने के अंदर उसी रेल खंड में दूसरी बड़ी रेल दुर्घटना फिर हो गई.) इससे आपको समझ जाना चाहिए कि सुधार बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, वरन् जमींनी काम से होते हैं. रेलवे में सुधार के लिए बहुत समितियां बनी हैं और उनकी रिपोर्टों पर चर्चाएं भी हुई हैं, परंतु जमीनी कार्य कुछ नहीं हुआ. रेलवे नौकरी में रहते हुए स्वयं मैंने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें संस्थागत भ्रष्टाचार द्वारा रेलवे की खरीदारी में हो रहे सालाना पांच हजार करोड़ रुपए के रिसाव को रोकने के लिए क्रियात्मक उपयोगी सुझाव दिए गए थे.

    वर्तमान पुनर्नियुक्त रेलवे बोर्ड अध्यक्ष ए. के. मितल स्वयं इस समिति के सदस्य थे, पर इस समिति की रिपोर्ट में संस्थागत भ्रष्टाचार से निपटने के लिए दिए गए संस्थागत सुधारों के सुझावों के प्रति भी आपकी सरकार उदासीन रही है, जबकि आप और आपके मंत्री आपकी सरकार के भ्रष्टाचार विरोधी होने का ढ़ोल पीटते रहे हैं. बताए गए भारी रिसाव की पुष्टि मेट्रो मैन ई. श्रीधरन ने भी तदोपरांत अपनी एक रिपोर्ट में की है. तथापि, रेलवे में यह सुझाव और सुधार आज तक लागू नहीं किए गए हैं.

    ऐसे अनेकों संस्थागत भ्रष्टाचार भारत में फल-फूल रहे हैं. इनको नजरअंदाज कर बड़ी-बड़ी बातें करते हुए आप जनता को मूर्ख बनाते ही प्रतीत होते हैं. केवल वाकपटुता और ड्रामे से कोई बात नहीं बनती. विश्वास कीजिए कोई भी जनता को हमेशा बेवकूफ नहीं बना सकता. आपको मालूम ही होगा कि नोटबंदी के बाद, बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से, या उसके बिना, बड़ी संख्या में कालेधन को सफ़ेद करने में लोगों ने कालाधन कमाना शुरू भी कर दिया है.

    मोदी जी, आप यह जरूर मानेंगे कि उपरोक्त तथ्यों के मद्देनजर आपकी विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगता है और बहुत से लोगों को आपकी नीयत पर शक हो रहा है. इसकी झलक साफतौर पर सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही है. साथ ही आपके विरोधी राजनीतिक दल कह रहे हैं कि नोटबंदी से पूर्व आपने इस बात की जानकारी कुछ उद्योगपतियों और दोस्तों को दे दी थी. यही कारण है कि आपके इरादे के खिलाफ अफवाहों का बाजार गर्म है. यह कहा जा रहा है कि आपका असली उद्देश्य बैंकों में पैसा लाना था, जिसका लाभ आगे आपके उद्योगपति मित्रों को मिल सके. हम यह आशा करते हैं कि इस तरह की बातें गलत साबित हों और आप गोवा में दिया अपना वचन निभाएंगे.

    बड़ी संख्या में यह कहने वाले लोग हैं कि सबसे पहले स्विस बैंकों में जमा धन वापस लाया जाना चाहिए. मैं ऐसे लोगों की इस सोच से सहमत नहीं हूं कि यदि आप सब कुछ नहीं कर सकते, तो आपको कुछ भी नहीं करना चाहिए.

    गोवा में आपकी आंखों में यह कहते समय आंसू आ गए थे कि आपने देश की खातिर अपने घर और परिवार का त्याग कर दिया. हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जी, आप इस बात को मानेंगे कि इस त्याग के कारण ही आपको दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का सर्वोच्च नेता चुना गया है. ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अपने देश के लिए प्राणों तक का बलिदान किया, पर वे आप जैसे भाग्यशाली नहीं थे कि उन्हें उचित सम्मान मिलता.

    यह पत्र लिखने का उद्देश्य आपकी छवि को मलिन करना नहीं है, बल्कि आपको और देश को वास्तविकता से अवगत कराना है. आप पिछली बातों को भूलकर आगे बढ़ें और भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े लोगों और नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करें. विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा यथाशक्ति हो-हल्ला करने के बाबजूद जनता आपके साथ है. आप को हमारे सपनों का भारत देना है, जिसमें..

    1. कुपोषित बच्चे न हों और कोई भी भूख से नहीं मरे.
    2. प्रत्येक नागरिक का रहन-सहन सम्मानजनक स्तर का हो.
    3. शिक्षा पर आने वाला व्यय आम लोगों की पहुंच में हो और शिक्षा उत्तम हो.
    4. बुजुर्गों की समुचित देखभाल हो और उन्हें जीवनयापन के लिए पर्याप्त पेंशन मिले.
    5. न्याय तुरंत या तय समय सीमा में मिले और वकीलों की मोटी फीसों का मोहताज़ न हो.
    6. अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र लोगों का उपचार कर उन्हें स्वस्थ करें, न कि उनके कपड़े उधेड़ें.
    7. देश में सांप्रदायिक एवं जातीय सद्भावना हो तथा अपने पड़ोसियों के साथ हमारे दोस्ताना संबंध हों.
    8. कोई भी रिश्वत मांगने का साहस न कर सके और न ही किसी को रिश्वत देने की आवश्यकता पड़े.
    9. संतोषजनक नागरिक सुविधाएं सभी नागरिकों को आसानी से सुलभ हों. यह पहले की तरह रिश्वत के पाये पर खड़ी न हों.

    यह है मेरे सपनों का भारत ! मैं जानता हूं कि यह सब करना कोई आसान काम नहीं, कहना आसान है. परंतु प्रधानमंत्री जी, ऐसा करने का वचन आपने स्वेच्छा से दिया है. भारत के लोग आपकी पुकार पर आगे आए हैं. वे घंटों पंक्तिबद्ध होकर तमाम तकलीफों का सामना कर रहे हैं. इस क्रम में वे अपने प्राणों का बलिदान भी कर रहे हैं, जिसके सामने आपका स्वघोषित बलिदान तुच्छ है.

    यह कहना अनुचित न होगा कि दर्जनों निर्दोष भारतीयों को जान गंवाने के लिए आपके सलाहकारों ने और इस देश की नौकरशाही ने मूर्खतापूर्ण और कोताही से भरपूर कार्यान्वयन के द्वारा विवश किया है. यदि आप में जरा भी संवेदलशीलता है, तो इन निरीह लोगों का बलिदान, जिनमें अधिकांश बुजुर्ग थे, आपको ताजीवन विवश करेगा कि आप बड़े भ्रष्ट लोगों पर कार्यवाही करें और संस्थागत भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद करें.

    हम आशा करते हैं कि केवल आम जनता, कालेधन के साथ जीना जिसकी आदत बना दी गई थी या बन गई थी, पर ही हमला करके आप चुप नहीं बैठ जाएंगे. यदि अब भी आप ऐसा नहीं करते हैं और पुराने ढर्रे पर चलते रहते हैं, तो आप अपने से पूर्व और समकालीन अन्य नेताओं से भी बड़े धूर्त और पाखंडी सिद्ध होंगे. जो जनता आज आपको सिर आंखों पर बिठा रही है, वह आपकी हकीकत और असली रूप जल्द ही समझ जाएगी. इतिहास भाड़े के टट्टुओं द्वारा नहीं लिखा जाएगा.

    नोटबंदी की घोषणा करते हुए आपने खुलेआम देश से कई झूठ बोले हैं. आपने कहा था कि 24 नवंबर के बाद से नोट बदलने की सीमा 4000 रुपयों से बढ़ा दी जाएगी, पर इसको समाप्त ही कर दिया गया. आपने कहा था कि रात्रि 12 बजे के बाद कलाधन कागज के टुकड़े होकर रह जाएगा, परंतु बाद में आयकर संशोधन क़ानून के द्वारा उसे सफ़ेद करने का प्रावधान कर दिया. आप समझ सकते हैं कि एक देश के प्रधानमंत्री के लिए यह कितना शर्मनाक है! उम्मीद करता हूं कि अब आप अपने झूठों से बाहर निकलेंगे और एक उच्चकोटि के सेल्समैन के साथ एक स्टेट्समैन भी बनकर दिखाएंगे, जिसकी क्षमता आप में है. आवश्यक साहस तो आप में है ही. तभी आप अपने वचनानुसार हमें हमारे सपनों का भारत दे पाएंगे. आपको 125 करोड़ भारतीयों की अपेक्षा पर अब खरा उतरना ही होगा.

    एक भारतीय नागरिक
    अतुल कुमार
    02.01.2017

सम्पादकीय