रेलमंत्री ने लाजवाब किया महाराष्ट्र के सांसदों को..
मुंबई : शुक्रवार, 2 मार्च को रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और सांसदों से रेल बजट सम्बन्धी चर्चा करने के लिए मुंबई आए थे. उनका मकसद रेल बजट में महाराष्ट्र के लिए किए जाने वाले प्रावधानों के सम्बन्ध में यहाँ के सांसदों की राय जानना था. विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंत्रालय में इस सम्बन्ध में हुई बैठक के दौरान मुंबई के कुछ सांसदों ने कहा कि मुंबई का सबर्बन रेल सिस्टम फायदे में है, इसका किराया नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. इस पर रेलमंत्री श्री त्रिवदी ने उनसे कहा कि इस सिस्टम से रेलवे को प्रतिवर्ष एक हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है और मुंबई का सबर्बन रेल सिस्टम दुनिया का सबसे सस्ता रेल सिस्टम है. जहाँ प्रतिमाह 52 अप-डाउन जर्नी के लिए मात्र 18 या 20 अप-डाउन जर्नी का ही किराया लिया जा रहा है. ऐसे में वह यह कैसे कह सकते हैं कि इसका किराया नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. और यदि वे यह मानते हैं कि यह सिस्टम लाभकारी है, तो वे (राज्य सरकार) ख़ुशी से इसे चलाने के लिए ले सकते हैं, वह इसे ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें सौंपने को तैयार हैं. इस पर सांसदों का कहना था कि मध्य रेलवे का सबर्बन रेल सिस्टम घाटे में हो सकता है, मगर पश्चिम रेलवे तो इसमें फायदे में है. इस पर तुरंत रेलमंत्री ने तपाक से हाजिर जवाब देते हुए उनसे कहा कि वे पश्चिम रेलवे का ही सबर्बन सिस्टम ले लें..! इसके बाद बताते हैं कि सांसदों की बोलती बंद हो गई.
प्राप्त जानकारी के अनुसार इसके बाद बैठक में सामान्य चर्चा हुई और उसके बाद एक आर्किटेक्ट के साथ रेलमंत्री श्री त्रिवेदी दादर और खार स्टेशनों का दौरा करने चले गए. बताते हैं कि इस आर्किटेक्ट ने रेलमंत्री को मुंबई के कुछ स्टेशनों पर पीपीपी के तहत वाणिज्यिक इस्तेमाल हेतु एक प्रस्ताव किया है. इसी की समीक्षा के लिए रेलमंत्री उक्त स्टेशनों पर गए थे. सूत्रों का कहना है कि इससे पहले भी इस आर्किटेक्ट ने पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी झांसा देकर मुंबई के तीन स्टेशनों पर इसी तरह का एक प्रस्ताव करा लिया था. जिसके लिए प. रे. ने इसे प्लानिंग करने हेतु करीब बीस लाख रू. का एक ठेका दे दिया था, जो कभी पूरा नहीं हुआ, मगर इसे लगभग चार लाख रू. का भुगतान दे दिया गया. बताते हैं कि उसकी इस प्लानिंग में रेल अधिकारियों को बीएमसी एरिया के दुकानदारों को रेलवे एरिया में घुसाने की गंध मिल गई थी, इसलिए रेलवे बोर्ड और इरकान ने तब इसके उक्त प्लान को हरी झंडी ही नहीं दिखाई थी, जिससे इसका वह प्लान तो फेल हुआ ही, बल्कि इसे बाकी 16 लाख रू. का भुगतान भी प. रे. नहीं किया था. तथापि इसे चार लाख रू. तो मुफ्त में मिल ही गए थे. अब अगर फिर से रेलवे इसे ऐसा ही कोई प्लान देने वाली है तो पुनः रेलवे को कुछ लाख रू. की चपत लग सकती है. हालाँकि सूत्रों का यह भी कहना है कि इसके पीछे कोई न कोई कार्पोरेट लाबी अवश्य होनी चाहिए, जो सबर्बन स्टेशनों की मौके की जगहों का इस्तेमाल अपने हित में करने के लिए इस आर्किटेक्ट को आगे करके चल रही है.