महाप्रबंधक के आदेश पर एसडीजीएम ने अमल नहीं किया..
मुंबई : करीब एक साल पहले रेलवे स्कूल कल्याण में पूर्व प्रिंसिपल और स्काउट मास्टर द्वारा मिलकर सील की गई अल्मारी आज भी उसी प्रकार पड़ी है. स्काउट मास्टर के नए अवतार विजिलेंस निरीक्षक संतोष केल्जी ने स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल के साथ क्या समझौता किया है और इन दोनों ने मिलकर इस अल्मारी को स्कूल परिसर क्यों में सील करके रखा है, यह आज एक साल बाद भी स्पष्ट नहीं है. स्काउट मास्टर और प्रिंसिपल ने इस अल्मारी के साथ क्या जादू किया है, यह भी एक बड़ी विसंगति बनी हुई है. यह अल्मारी अभी तक क्यों बंद है, यह किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है. हालाँकि पूर्व प्रिंसिपल और पीएचएम दोनों को रेल प्रशाशन ने मेजर पेनाल्टी चार्जशीट (एसएफ़-5) दी है. यह मामला विजिलेंस डिपार्टमेंट ने अपनी पुस्तिका में प्रकाशित करके अपनी पीठ भी थपथपाई है, मगर इस मामले में महाप्रबंधक के आदेश का उल्लंघन करके विजिलेंस ने अपरोक्ष रूप से उनकी भारी मदद की है. एसडीजीएम ने एक ऐसे विजिलेंस इंस्पेक्टर को मामले की जाँच सौंपी जो एक स्काउट मास्टर रहा है और लेखा संबंधी उसका ज्ञान जीरो है, कम से कम स्कूल में हुई गड़बड़ी के मामले तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है. उधर कुछ कार्मिक अधिकारी और उच्च स्तर पर बैठे कुछ अन्य अधिकारी भ्रष्ट प्राचार्य को बचाने के लिए उसके 'कुकर्मो' में शामिल हो गए हैं.
पूर्व पीएचएम का प्रभाव पूर्व प्राचार्य पर इतना ज्यादा था कि वह उसके नीचे रहते और कोई अधिकार न होते हुए भी प्राचार्य के स्थान पर हस्ताक्षर खुद करती थी. जैसे यहाँ दी गई चालान की कापी से स्पष्ट होता है. रेल राजस्व में भरने के बहाने यह दोनों कई बार बैंक से पैसा निकालते थे मगर रेलवे एकाउंट्स आडिट में पता चला कि यह पैसे रेलवे कोष में जमा नहीं हुए हैं. इस प्रकार वर्ष 2009-10 में करीब एक लाख रूपया पूर्व प्राचार्य ने निगल लिया. स्काउट मास्टर उर्फ़ विजिलेंस इंस्पेक्टर संतोष केल्जी ने इसकी अनदेखी करके इसका आरोप स्कूल के ओएस पर डालने का नाटक किया, जबकि यह सब दोनों 'अनाकोंडों' की मर्जी पर होता था. स्कूल के ऑफिस स्टाफ का इसमें कुछ हिस्सा नहीं था. पूर्व पीएचएम खुद पैसा निकालती थी और चेक पर खुद हस्ताक्षर करती थी. उपलब्ध कागजात से यह तथ्य प्रमाणित हैं. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009-10 की स्कूल की बैलेंस शीट में लगभग 72000 रु. कैश और करीब 15000 रु. सस्पेंस एकाउंट में दर्शाए गए थे, जो कि एकाउंट्स की किसी भी परिभाषा में फिट नहीं होते हैं. यह तथ्य अब तक म.रे. विजिलेंस और एकाउंट्स या आडिट की समझ में इसलिए नहीं आया है, क्योंकि ऐसा कभी होता ही नहीं है. इसीलिए प्राचार्य और पीएचएम को बचाया जा रहा है. वरना यही एक मुद्दा इन दोनों को बर्खास्त करने के लिए पर्याप्त साबित होता.
इन दोनों की भ्रष्टता इतनी ज्यादा थी कि यह दोनों मिलकर एक ही काम के लिए दो-दो बार भुगतान करते थे. यह भी प्रमाणित है. स्काउट मास्टर केल्जी से इस बारे में जवाबतलब किया जाना चाहिए कि कैसे इन दोनों ने जनवरी 2010 को ऐनुअल डे के नाम से दो-दो भुगतान किया और रेल राजस्व का करीब एक लाख रूपया हड़प लिया? उसको यह भी जवाब देना मुश्किल होगा कि कैसे स्कूल से चोरी किया गया डेस्क टॉप कम्प्यूटर प्राचार्य ने विजिलेंस जाँच से डरकर स्कूल के पी. टी. मास्टर की अल्मारी में छुपाया था? आज तक रेलवे के किसी भी कार्यालय में डेस्क टॉप कम्प्यूटर अल्मारी में नहीं रखा गया, मगर कल्याण स्कूल में एक कम्प्यूटर आज भी पी. टी. मास्टर की अल्मारी में छुपाकर रखा हुआ है.
एक साल में भी जाँच पूरी नहीं..
कल्याण रेलवे स्कूल और इसके विद्यार्थियों को हुए नुकसान को छिपाने तथा इन दोनों अनाकोंडों को बचाने की कोशिश यदि कोई अधिकारी कर रहा है अथवा उसके किन्हीं क्रिया-कलापों से ऐसा जाहिर होता है, तो यह माना जाएगा कि वह भी इस लूट में इन दोनों के साथ शामिल है. क्योंकि लगभग एक साल होने जा रहा है मगर इन दोनों अनाकोंडों के भ्रष्टाचार से सम्बंधित एक सीनियर टीचर द्वारा की गई एक गंभीर शिकायत की विजिलेंस जाँच अभी तक पूरी नहीं हुई है. पहले तो इस शिकायत को ही गायब कर दिया गया था. मगर 'रेलवे समाचार' द्वारा इस तथ्य को उजागर किए जाने के बाद करीब छह महीने बाद यह कहकर इस शिकायत को सतह (रिकॉर्ड) पर लाया गया कि यह गायब नहीं हुई थी, बल्कि फाइलों में दब गई थी. तब से लेकर अब तक दस महीने बीत चुके हैं, मगर इसकी विजिलेंस जाँच अभी तक पूरी नहीं हुई है. यह तथ्य खुद विजिलेंस ने आरटीआई में दिए गए अपने जवाब में स्वीकार किया है. जबकि नियमानुसार किसी भी मामले की जाँच 90 दिनों में पूरी होनी चाहिए.
इस तमाम गड़बड़-घोटाले की मुख्य वजह यह है कि करीब एक साल पहले तत्कालीन महाप्रबंधक/म.रे. और वर्तमान मेम्बर इलेक्ट्रिकल रे. बो. श्री कुलभूषण द्वारा दिए गए आदेश पर म. रे. विजिलेंस के चीफ (एसडीजीएम/सीवीओ) ने कतई अमल नहीं किया. उल्लेखनीय है कि 'रेलवे समाचार' की मांग पर श्री कुलभूषण ने एसडीजीएम/म.रे. को तत्काल यह आदेश दिया था कि कल्याण रेलवे स्कूल से सम्बंधित सभी मामलों की जाँच से विजिलेंस इंस्पेक्टर संतोष केल्जी को तुरंत प्रभाव से अलग कर दिया जाए और किसी काबिल इंस्पेक्टर को इन मामलों की जाँच के लिए लगाया जाए और जाँच को जल्दी पूरा किया जाए. ज्ञातव्य है कि इसके कुछ समय बाद ही श्री कुलभूषण मेम्बर बनकर रे. बो. चले गए और एसडीजीएम/म.रे. ने समझ लिया कि एक मामले की जाँच करके दोनों अनाकोंडों को चार्जशीट दे देने से मामला ठंडा पड़ जाएगा, तो अब उनकी इस कोताही पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा.
'रेलवे समाचार' द्वारा इस बारे में जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने महाप्रबंधक के आदेश पर अमल क्यों नहीं किया और संतोष केल्जी को स्कूल के मामलों से अलग क्यों किया गया, सम्बंधित मामले की जाँच केल्जी ने आज दस महीनो बाद भी पूरी क्यों नहीं की है? तो इन सभी सवालों के जवाब में एसडीजीएम का वही पुराना और घिसा-पिटा जवाब था कि उनके पास आदमी नहीं हैं. उन्होंने यह कहकर भी अपने आपको सही साबित करने की कोशिश की कि उन्होंने स्कूल में हुई करीब 22 लाख की अनियमितता को उजागर करके मेजर चार्जशीट दी हैं. उन्हें जब यह बताया गया कि यदि उन्होंने पेंडिंग शिकायत की जाँच को समय से पूरा किया होता और महाप्रबंधक के आदेश पर अमल करते हुए यदि केल्जी को इस मामले से अलग कर दिया होता तो अब तक दोनों को वे घर भेजने में सफल हुए होते. बजाय इस बात का कोई उचित जवाब देने के एसडीजीएम महोदय का कहना था कि रेलवे में स्कूल होने ही नहीं चाहिए. उनकी इस बात से यह अंदाज बखूबी लगाया जा सकता है कि कुछ कार्मिक अधिकारियों के साथ ही वह भी इस तरह से दोनों भ्रष्टाचार्यों को बचाने में काफी मददगार रहे हैं. इसीलिए उन्होंने महाप्रबंधक के आदेश पर अमल करना जरूरी नहीं समझा.
म. रे. विजिलेंस अथवा एसडीजीएम की इस महा-भयानक लापरवाही का परिणाम यह है कि दौंड रेलवे स्कूल को इस भ्रष्टाचार्य ने बंद करने का बीड़ा उठा लिया है. म. रे. प्रशासन को भी इसकी जानकारी है, मगर वह इसे यह कहकर टाल रहा है कि अभिभावक ही अपने बच्चों को उक्त स्कूल में नहीं भेज रहे हैं. परन्तु वास्तविकता यह है कि कल्याण स्कूल के पूर्व और दौंड स्कूल के वर्तमान प्राचार्य ने बच्चों को एडमिशन ही नहीं दिया और पहली एवं दूसरी की कक्षाएं पूरी तरह बंद कर दी हैं. इस साल उन्होंने अब तक करीब 60 से 70 छात्रों को स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट देकर दूसरे निजी स्कूलों में यह कहकर भेज दिया है कि यह स्कूल बंद हो रहा है, वे अभी से अच्छे स्कूलों में चले जाएं, जबकि अभी करीब 40 छात्रों की एक लिस्ट एक निजी स्कूल ने भेजी है कि उनकी लीविंग सर्टिफिकेट दे दी जाए वे उसके यहाँ एडमिशन लेना चाहते हैं. दौंड स्कूल के विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि यह प्राचार्य बिना पैसा (रिश्वत) लिए कोई एडमिशन नहीं देता है. यह बात तो कल्याण रेलवे स्कूल में पहले ही साबित हो चुकी है. सूत्रों का कहना है कि प्राचार्य ने इन निजी स्कूलों से अपनी साठ-गाँठ कर ली है और वहां अपने रेलवे स्कूल के बच्चों को भेज रहे हैं. प्राचार्य की यह प्रगति मुंबई मुख्यालय से लौटने के बाद की है. इससे जाहिर है कि उसे कुछ कार्मिक अधिकारियों और विजिलेंस का अभयदान प्राप्त है, जिनकी बदौलत राष्ट्रध्वज उल्टा फहराने के मामले की उसकी फाइल आज कार्मिक विभाग से गायब है और तीन बच्चे होने के बाद भी वह पिछले करीब 10-12 साल से प्रतिमाह लगभग 600 रु. फेमिली प्लानिंग एलाउंस ले रहा है मगर किसी कार्मिक अधिकारी को आज तक इसका संज्ञान लेने की जरूरत महसूस नहीं हुई है.
पुजारी, काजी, बिशप, डाक्टर, वकील, पत्रकार सहित प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों को नियम-कानून में कोई छूट नहीं है, बल्कि इनके ऐसे किसी भी कदाचार के लिए अदालतें इन्हें समाज के लिए उदाहरण बनने वाला अधिकतम दंड (एक्जाम्प्लरी पनिशमेंट) देती हैं. हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कई निर्णय इस बात के उदाहरण हैं. इन्ही में से अध्यापक/प्रोफेसर भी एक जीव है, जिसे भ्रष्टाचार, कदाचार, चरित्रहीनता जैसे कुकर्मो के लिए अन्य सभी से ज्यादा दंड दिया जाता है, क्योंकि यह जीव समाज की बुनियाद के निर्माण का एक अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य करता है. यदि यही जीव ऐसे तमाम कुकर्मो में लिप्त पाया जाता है, तो इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि यह कैसे समाज का निर्माण कर रहा होगा. मगर सम्बंधित प्राचार्य के खिलाफ ऐसे कुकर्मो के ढेरों सबूत मौजूद होने के बाद भी यदि रेल प्रशासन में बैठे लोग यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, तो शायद यहाँ यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे भी भ्रष्ट समाज के निर्माण में उक्त प्राचार्य का साथ दे रहे हैं और न सिर्फ उसके तमाम कुकर्मो में शामिल हैं, बल्कि उसकी हर प्रकार की लूट में अपना हिस्सा भी बंटा रहे हैं.