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जीएम के रूप में चुनौतियाँ ही चुनौतियाँ हैं - सुबोध जैन

श्री सुबोध कुमार जैन को मध्य रेल का महाप्रबंधक बने हुए करीब नौ महीने पूरे हो रहे हैं, 9 नवम्बर 2011 को उन्होंने यह पदभार संभाला था. 18 नवम्बर 2011 को उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में मुंबई सबर्बन रेल नेटवर्क पर कुछ नई यात्री सुविधाओं सहित अपने कुछ ड्रीम प्रोजेक्ट्स की बात कही थी. उन्होंने इन नौ महीनो में क्या किया है, उनके ड्रीम प्रोजेक्ट्स कहाँ तक पहुंचे हैं, मुंबई सबर्बन रेल नेटवर्क पर आए दिन सर्विस फेल्यूर होने के क्या - क्या कारण हैं, इन सभी पहलुओं पर महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन से 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' की मुंबई ब्यूरो प्रमुख कविता शर्मा ने विस्तार से बात की. प्रस्तुत है इस बातचीत का विवरण..

 

प. रे. स. : म. रे. के महाप्रबंधक का पदभार संभाले हुए आपको करीब आठ महीने से ज्यादा समय हो गया है. इस दरम्यान आपकी विशेष उपलब्धियां क्या रही हैं और क्या आप अपने मिशन-लक्ष्यों को हासिल कर पाए हैं?

सुबोध जैन : यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण पद सँभालने के बाद हमने सबर्बन यात्रियों के हित में कुछ मिशन - लक्ष्य अवश्य तय किए थे. उन सभी में संतोषप्रद तरीके से काम आगे बढ़ रहा है. इनमें से सभी प्लेटफार्मो पर पूरी छत लगाना, आवश्यक फुट ओवर ब्रिज (एफओबी) बनाना और प्रमुख स्टेशनों पर सर्वसुविधा संपन्न टायलेट बनाना तथा साफ़-सफाई सुनिश्चित करना प्रमुख रूप से तय किया गया था. मेरे इन मिशन लक्ष्यों को पाने की शुरुआत हो गई है. जहाँ पूरी छत नहीं थी, ऐसे सभी प्लेटफार्मो पर छत लगाने का काम चालू है. सात स्टेशनों पर एफओबी का काम पूरा हो गया है. ठाणे और परेल का काम भी अगले महीने तक पूरा हो जाएगा. दादर, घाटकोपर, कुर्ला, ठाणे और कल्याण में टायलेट बनाने की शुरुआत हो रही है. यह काम भी अगले दो-तीन माह में फाइनल हो जाएँगे. इस काम के लिए जिस पूर्व निर्धारित फ़र्म के बैक आउट हो जाने से थोड़ी देरी अवश्य हुई है, मगर फिर भी अन्य फ़र्मो के सामने आ जाने से काम का कोई नुकसान नहीं हुआ है.

प.रे.स. : आपका एक लक्ष्य मुंबई सबर्बन के प्रमुख स्टेशनों पर यात्रियों के लिए डोरमेट्री बनाने का था, उसका क्या हुआ?

सुबोध जैन : हाँ, हमारा एक मिशन लक्ष्य ठाणे, कल्याण, दादर और सीएसटी में यात्रियों की सुविधा के लिए लो-कास्ट एसी डोरमेट्री बनाने का भी था, जिसके तहत हमने ठाणे और कल्याण में यह यात्री सुविधा शुरू कर दी है, इसको बहुत अच्छा रेस्पांस मिला है. जबकि दादर और सीएसटी में इसका काम चालू है, यहाँ भी यह जल्दी ही शुरू हो जाएगी. कुर्ला टर्मिनस की नई बिल्डिंग बनकर तैयार है, इसमें भी हमने अन्दर एसी हाल बनाया है.

प.रे.स. : सबर्बन में ट्रेस पासिंग एक गंभीर समस्या है, इस मामले में आपको क्या सफलता मिली है?

सुबोध जैन : ट्रेस पासिंग की थोड़ी समस्या है, परन्तु इस पर आरपीएफ का सघन अभियान चल रहा है और छत पर यात्रा करने वालों एवं चलती लोकल में स्टंट करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है.

प.रे.स. : गाड़ी एवं प्लेटफार्मो के बीच की दूरी के कारण भी सबर्बन में कई बार यात्रियों की जान चली जाती है. इस गैप को भरने और प्लेटफार्मो को ऊँचा करने के मामले में क्या प्रगति हुई है?

सुबोध जैन : इस समस्या पर रेलवे बोर्ड ने हमारा बहुत सहयोग किया है और हमें ऐसे सभी प्लेटफार्मो की ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति दी है. इस तरह के पांच प्लेटफार्मो की ऊंचाई बढ़ाने का काम तेजी से चल रहा है. ऐसे कुछ और प्लेटफार्मो की पहचान की गई है, जो निर्धारित मानक से नीचे हैं, उनको भी ऊँचा करने का काम इस साल के अंत तक यानि दिसंबर तक पूरा कर लिया जाएगा. हाँ, एक बात और बता दूँ कि हमने लोकल में विकलांगों के लिए आरक्षित डिब्बे में गर्भवती महिलाओं को यात्रा करने की सुविधा भी मुहैया कराई है.

प.रे.स. : मुंबई के इतने विशाल सबर्बन रेल नेटवर्क में खासतौर पर एक महाप्रबंधक के रूप में क्या-क्या चुनौतियाँ हैं?

सुबोध जैन : यहाँ सिर्फ चुनौतियाँ ही चुनौतियाँ हैं, बाकी कुछ नहीं है. यहाँ सबसे बड़ी चुनौती लोकल गाड़ियों का सुचारू संचालन है, क्योंकि इनके थोड़ा भी रुक जाने का असर पूरी मुंबई पर पड़ता है. इसका कारण यह है कि मुंबई की अस्सी प्रतिशत आबादी लोकल गाड़ियों पर निर्भर है. इनमें आई थोड़ी सी भी शिथिलता लाखों यात्रियों को प्रभावित करती है. इसके अलावा करीब 1600 लोकल गाड़ियाँ चलाने के साथ ही लम्बी दूरी की गाड़ियों की आवाजाही को भी ठीक रखना अपने आपमें एक और चुनौती है. हम यह सब इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि हमारा बैकडोर स्टाफ पूरी लगन और मेहनत से लगातार काम करता है.

प.रे.स. : डीसी-एसी कन्वर्जन में प. रे. ने म. रे. से बाजी मार ली है. म. रे. में यह काम कब तक पूरा हो जाएगा?

सुबोध जैन : ऐसा है कि यहाँ कोई कम्पैरिजन नहीं हो सकता है. अगर हम यह कहें कि प. रे. सबर्बन में कोई ब्रांच लाइन नहीं हैं, इसलिए वहां डीसी-एसी कन्वर्जन काफी हद तक आसान था और इसीलिए वहां यह काम जल्दी पूरा हो गया, तो शायद गलत नहीं होगा. मगर म. रे. सबर्बन की समस्याएँ अलग हैं. यहाँ कई ब्रांच लाइन हैं और प.रे. की अपेक्षा म. रे. में यह काम काफी जटिल किस्म का है. तथापि अपने सीमित संसाधनों के साथ म. रे. का डीसी-एसी कन्वर्जन कार्य अपनी गति से आगे बढ़ रहा है और उम्मीद करते हैं कि अगले साल के अंत तक यह पूरा हो जाएगा.

प.रे.स. : देखने में आया है कि ईएमयू और सिग्नल फेल्यूर की घटनाएँ कुछ बढ़ी हैं, इसका क्या कारण हो सकता है?

सुबोध जैन : पुराने सिग्नल्स को बदलने का काम तेजी से चल रहा है. डीसी-एसी कन्वर्जन और प्लेटफार्मो की लम्बाई बढ़ने से भी कई सिग्नल्स की रिस्पेसिंग का काम हो रहा है. जहाँ तक ईएमयू के फेल होने की बात है तो मैं मानता हूं कि इसके मेंटिनेंस की सुविधाएँ आवश्यकता से कम हैं. इसकी नई सुविधाएँ बनाने का प्रयास किया जा रहा है. मगर समस्या शहर के तीव्र विकास से हो रही है, क्योंकि हम जितनी भी नई सुविधाएँ तैयार करते हैं वह अगले ही दिन कम पड़ने लगती हैं. शहर का तेजी से और रेल आधारित विकास होने की वजह से ओपन स्पेस नहीं रह गया है, इस कारण नई सुविधाएँ स्थापित करने में भारी समस्या हो रही है, जबकि शहर की सबर्बन लाइन गटर में तब्दील होती जा रही हैं, क्योंकि रेल लाइन का लेवल तो ऊपर उठ नहीं रहा है, जबकि शहर का लेवल ऊपर उठ गया है, जिससे रेल पटरियों पर वाटर लागिंग की समस्या हो रही है और इसलिए ऐसी जगहों पर एक्सेल काउंटर लगाने पड़ रहे हैं.

प.रे.स. : मुंबई सबर्बन के अलावा म. रे. के अन्य मंडलों नागपुर, भुसावल, पुणे और सोलापुर में आपने यात्री सुविधाओं से सम्बंधित क्या नए कार्य किए हैं?

सुबोध जैन : हाँ, मुंबई के अलावा भी अन्य मंडलों पर यात्री सुविधाओं से सम्बंधित कई काम किए गए हैं. पुणे - लोनावाला लोकल में कोच बढाए गए हैं और ट्रेक में सुधार से गति भी बढाई है. शिवाजी नगर स्टेशन को सबर्बन स्टेशन की तरह विकसित किया जा रहा है. जबकि शिवाजी नगर और तलेगाँव के बीच तीन लोकल सेवाएँ बढाई गई हैं. शिवाजी नगर स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6 को विस्तारित किया जा रहा है और यहाँ इंटरसिटी एक्सप्रेस का स्टापेज दिया जा रहा है. प्रगति एक्सप्रेस को बदले हुए रूट दिवा-पनवेल-कर्जत के रास्ते चलाए जाने का निर्णय लिया गया है. इसी तरह नागपुर, भुसावल और सोलापुर मंडलों पर भी अन्य यात्री सुविधाओं पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है.

प.रे.स. : एक तरफ आपका प्रयास यात्री सुविधाओं के नए-नए आयाम स्थापित करने का है, दूसरी तरफ मुंबई मंडल में आए दिन नए-नए फेल्यूर हो रहे हैं, इनसे निपटने और पूरी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने के लिए आपकी क्या कार्य-योजना है?

सुबोध जैन : मैं मानता हूं कि इधर मुंबई मंडल में फेल्यूर कुछ बढे हैं, मगर इसमें मानवीय गलती नहीं है. यह सही है कि परिसंपत्तियां कुछ पुरानी पड़ रही हैं और व्यवस्था में भी कुछ-कुछ ठहराव सा आ गया लगता है. अब अगर फेल्यूर नहीं होंगे तो पूरी व्यवस्था और परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण का मौका कैसे मिलेगा. यह तो लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. प्रकृति भी तो इसी प्रक्रिया से संचालित हो रही है. फिर भी हमने कोई जोखिम लिए बिना अधिकारियों के निरीक्षण अन्तराल को तीन महीने से कम करके हर महीने कर दिया है. इसके अलावा इंस्पेक्टर्स के निरीक्षण को और बढ़ाया गया है. यह इन्फ्रास्त्रक्चर की कमजोरी है. एक बार एसी-डीसी कन्वर्जन पूरा हो जाए, हालाँकि उसको भी स्टेबल होने में दो-चार महीने का समय लगेगा, मगर तब परिसंपत्तियों और परिस्थितियों में स्थाई सुधार हो जाएगा.

प.रे.स. : क्या इन फेल्यूर पर अधिकारी स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाएगी?

सुबोध जैन : विभागीय और सीआरएस स्तर पर जाँच चल रही हैं. इन जांचों की रिपोर्ट आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जा सकेगा. रेलवे में गलती करके कोई बचता नहीं है, उसे उसकी गलती की सजा कहीं न कहीं अवश्य मिलती है. इसलिए इस बारे में ज्यादा सोचने - विचारने की जरूरत नहीं है. सिस्टम अपना काम बखूबी करता है.

प.रे.स. : आपका मानना रहा है कि यात्री गाड़ियों का रख-रखाव उच्च स्तर का होना चाहिए. देश की पहली गाड़ी को आईएसओ सर्टिफिकेशन आपके डीआरएम/भोपाल के कार्यकाल में ही मिला था. म. रे. में यात्री गाड़ियों की क्या स्थिति है?

सुबोध जैन : म. रे. पर लम्बी दूरी की 14 गाड़ियों में यात्रियों के लिए कन्फर्म रिजर्वेशन चालू किया गया है. इसके अलावा पांच अन्य गाड़ियों - सेवाग्राम, डेक्कन क्वीन, सीएसटी-लखनऊ, पुणे इंटरसिटी और विदर्भ एक्सप्रेस - में विशेष यात्री सुविधाओं और साफ-सफाई की शुरुआत की गई है. इन गाड़ियों में टायलेट के पास ग्रीन चटाई और कोच के अन्दर पैसेज में भी चटाई डाली गई है जिससे कोच के अन्दर कीचड़ नहीं होगा. साथ ही नाइट सीट इंडिकेटर लगाए गए हैं, जिससे रात में लाईट बंद होने पर यात्रियों को अपनी सीट/बर्थ खोजने में परेशानी नहीं हो. मुंबई सबर्बन में फ़िलहाल एक लोकल रेक के सभी सामान्य लेडीज एवं जेंट्स कोचों में कुशन लगाकर सबर्बन यात्रियों को थोड़ी ज्यादा सहूलियत दी गई है. ऐसे दो और कोचों में यह सुविधा और देने का प्रयास किया जा रहा है.

प.रे.स. : डायमंड क्रासिंग और एक विशेष रेल लोडिंग रेक भारतीय रेल को आपकी एक अभिनव एवं महत्वपूर्ण देन है. क्या ऐसा कोई और इंजीनियरिंग करिश्मा आपने किया है?

सुबोध जैन : ऐसी कुछ और खोजें तो हुई हैं मगर उनमें से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण खोज का उल्लेख तो आपने कर ही दिया है. इसके अलावा रेलवे बोर्ड ने हमारे कुछ प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान दिया है, जिससे रेलवे के दैनंदिन कामकाज में उनका प्रभाव देखने को मिलता है. इस बारे में और ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं होगा.

प.रे.स. : यात्रियों के साथ-साथ कर्मचारी कल्याण पर भी आपका काफी ध्यान रहता है. इस मामले में आपकी क्या उपलब्धियां रही हैं?

सुबोध जैन : कर्मचारी कल्याण एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. इसके लिए रेलवे में एक पूरा विभाग है. हम अपने तौर पर उनके प्रमोशन, ट्रांसफ़र और मानव अधिकार पर विशेष ध्यान रखते हैं. कर्मचारियों से मिलने के लिए हमारे कार्यालय के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं. कई बार उनकी पारिवारिक समस्याएँ भी सामने आती हैं, हम उन्हें भी मानवीय आधार पर सुलझाने का पूरा प्रयास करते हैं. हम उनके सुख-दुःख में हमेशा उनके साथ रहते हैं. इससे उनको मनोबल बढ़ता है और उनके उत्पादन एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती है.

प.रे.स. : कार्मिक, लेखा और चिकित्सा विभाग, जो सीधे कर्मचारियों से सम्बंधित विभाग हैं, इन विभागों की कार्य-प्रणाली के बारे में कर्मचारियों में काफी असंतोष देखने को मिलता है. म. रे. के कार्मिक विभाग की कार्य-प्रणाली से तो गत दिनों रे. बो. के मेम्बर स्टाफ भी काफी नाखुश दिखाई दिए और उन्होंने एक अधिकारी का फ़ौरन ट्रांसफ़र भी कर दिया था. कर्मचारी काफी असंतुष्ट हैं. क्या आप इस तरफ अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं और क्या आपने कोई लक्ष्य तय किया है?

सुबोध जैन : इन विभागों के बारे में हमें कोई विशेष शिकायत तो नहीं मिली है. मगर हाँ, कुछ तो गड़बड़ी हुई थी, जिसके कारण मेम्बर स्टाफ को वैसा कदम उठाना पड़ा. फिर भी कोई खास चिंताजनक स्थिति नहीं है. हमारे सभी विभागीय प्रमुख अपना काम बखूबी कर रहे हैं. हम उनके विभागीय कामकाज में कोई दखल नहीं देते हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि उनके सही-गलत काम के लिए वह खुद जिम्मेदार हैं, जो जैसा करेगा वह वैसे ही पुरस्कार का भागीदार बनेगा.

प.रे.स. : मगर जोन के सर्वेसर्वा होने के नाते अपने मातहत विभाग प्रमुखों के कामकाज के प्रति आपकी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है? उनके अच्छे-बुरे कामकाज के तौर-तरीकों का आपकी छवि पर भी तो असर पड़ता है?

सुबोध जैन : हाँ, अवश्य बनती है, मगर वह ओवरआल परफार्मेंस के लिए बनती है, न की उनके व्यक्तिगत और विभागीय कामकाज के लिए.. इसीलिए हम उनके विभागीय कामकाज में कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं. जहाँ तक छवि पर असर पड़ने की बात है तो यह हमारे अपने अच्छे-बुरे कामकाज और व्यवहार पर निर्भर करता है.

प.रे.स. : महाप्रबंधक जैसी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सँभालने के बाद आप अपने और अपने परिवार के लिए कितना समय निकाल पाते हैं?

सुबोध जैन : पहली बात यह है कि जिंदगी अपने ढर्रे पर चल रही है. दूसरी बात यह है कि परिवार और नौकरी के बीच एक सामंजस्य बैठाकर चलना पड़ता है, क्योंकि पद और जिम्मेदारी चाहे जितनी बड़ी हो वह परिवार से ऊपर कभी नहीं हो सकती है. नौकरी के इस लम्बे दौर में अब यह सब बहुत सामान्य हो चला है. हम अपने परिवार को पर्याप्त समय देते हैं और अब तो नाती भी हो गया है, उसके साथ खेलने में भी बहुत मजा आता है और इस खेल में हम अपनी नौकरी और जिम्मेदारी की तमाम परेशानियों को कुछ देर के लिए भूल जाते हैं. व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ कार्यालयीन जिम्मेदारियों को निभाने में हमें कोई समस्या आड़े नहीं आती है.

श्री सुबोध जैन यह साक्षात्कार देने के समय पूरी तरह सामान्य रहे. किसी भी सवाल का जवाब देते समय ऐसा नहीं लगा की उन्हें कोई समस्या है. बहुत बेबाक और बेलाग रही उनसे यह बातचीत. इस दौरान कोई झिझक या कोई संकोच उनके चहरे पर नहीं दिखाई दिया. यदि श्री सुबोध जैन की ही तरह रेलवे के अन्य बड़े अधिकारी भी सर्वसामान्य के साथ इसी तरह का खुला व्यवहार रखें तो शायद समस्याएँ कम होंगी और जो भी समस्याएँ होंगी उनका समाधान भी सामान्य तरीके से किया जा सकता है. तब न तो कहीं कोई ग़लतफ़हमी नहीं होगी और न ही कोई समस्या होगी.

प्रस्तुति : सुरेश त्रिपाठी.

 

 

 

 


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