कल्याण रेलवे स्कूल में बहाल हुई शांति..
करीब चार साल पहले मध्य रेलवे के तत्कालीन मंडल एवं मुख्यालय अधिकारियों और एक यूनियन के कुछ पदाधिकारियों तथा पूर्व प्राचार्य की मिलीभगत से लगभग बरबाद हो चुके रेलवे स्कूल कल्याण में फैली अशांति अब जाकर शांति में बहाल हो पाई है, जब यहाँ की प्राइमरी हेडमिस्ट्रेस (पीएचएम) का भी तबादला कर दिया गया है. उल्लेखनीय है कि इससे करीब दो साल पहले यहाँ के पूर्व प्राचार्य का तबादला दौंड के स्कूल में पद के साथ करके रेल प्रशासन ने इस स्कूल को कुछ हद तक बचाया था. तब जो कसर बाकी रह गई थी, वह अब पीएचएम को यहाँ से हटाकर पूरी की गई है. बताते हैं कि वह यहाँ से चार्ज छोड़ने से पहले बहुत सारे महत्वपूर्ण कागजात जलाकर गई हैं. और उनके जाने के बाद यह पता चला है कि वह यहाँ एक भी पीरियड पढ़ाने क्लास में कभी नहीं जाती थीं, जबकि नई पीएचएम नियमानुसार न सिर्फ खुद हफ्ते में 18 पीरियड पढ़ा रही हैं, बल्कि उन्होंने बाकी सभी प्राइमरी टीचर्स को नियमानुसार हफ्ते में 32 पीरियड पढ़ाने की ड्यूटी लगा दी है. बताते हैं कि यह ड्यूटी लगाए जाने के बाद ही यह राज तब खुला जब प्राइमरी टीचर्स ने वर्तमान पीएचएम से शिकायती लहजे में कहा कि 'मैडम' तो उनसे हफ्ते में सिर्फ 10-12 पीरियड ही पढवाती थीं..! इससे अब यह भी साफ हो गया है कि इस बचे हुए बहुत सारे समय का 'सदुपयोग' पूर्व पीएचएम द्वारा स्कूल में अशांति फ़ैलाने और बाहरी तत्वों को बुलाकर अपने चेंबर में पंचायत करने के लिए किया जाता था.
यह भी ज्ञात हुआ है कि पूर्व पीएचएम के तबादले का आदेश मुख्यालय से 16 जनवरी 2012 को जारी हुआ था, मगर मंडल और मुख्यालय के कुछ निचले स्तर के निहितस्वार्थी तत्वों ने इसे करीब बीस दिन तक दबाकर रखा था, जब इसका पता चला तब मैडम पीएचएम अचानक स्कूल से बिना बताए ही हफ्ते भर तक गायब रहीं, मगर अंततः उन्हें यह कहते हुए यहाँ से जाना पड़ा कि उनका तबादला तो इंटरडिवीजन हुआ था, परन्तु उन्होंने इसे मुंबई में करा लिया है और वह फिर से यहाँ जल्दी ही वापस आएंगी. तथापि उनके तबादले का यह आदेश बीस दिनों से ज्यादा समय तक किसने, किसके कहने पर और क्यों दबाकर रखा था, यह तो फ़िलहाल पता नहीं चल सका है, और न ही मंडल कार्मिक कार्यालय इस बात का कोई जवाब दे रहा है. मगर इस बारे में जब पता चला था तो एपीओ अशोक त्रिवेदी का मातहत कार्मिक स्टाफ बार-बार फैक्स करने के लिए कहे जाने के बावजूद स्कूल को यह आदेश फैक्स करने से यह कहकर टालता रहा कि अभी एपीओ ने 'कवरिंग लेटर' पर 'साइन' नहीं किया है. जबकि दूसरे दिन उन्होंने स्कूल से भेजे गए आदमी को बिना किसी कवरिंग लेटर के ही उक्त आदेश की प्रति पकड़ा दी थी. यह बात समझ से परे है कि मुख्यालय के आदेश को कथित कवरिंग लेटर की क्या आवश्यकता थी? इस सम्बन्ध में हुई लापरवाही और सम्बंधित कार्मिक स्टाफ के निहित उद्देश्य की जाँच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ समुचित दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए.
यह भी पता चला है कि पूर्व प्राचार्य के साथ मिलकर स्कूल में अव्यवस्था फ़ैलाने वाली कल्याण रेलवे स्कूल की इस पूर्व पीएचएम ने दो मामलों में करीब आठ लाख रुपये की हो रही अपनी रिकवरी रुकवाने के लिए 'कैट' में गुहार लगाई है. हालाँकि न्याय पाने के लिए अंत तक लड़ने में कोई हर्ज़ नहीं है और न ही इसके लिए किसी को रोका जा सकता है, मगर कैट में दाखिल की गई इस याचिका में जिस तरह से रेल प्रशासन को दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया गया है, उसके मद्देजज़र यदि रेल प्रशासन सतर्क नहीं रहा, तो उसके बुरी तरह से गच्चा खा जाने की संभावना है, क्योंकि इस याचिका में ऐसा कुछ कहा गया है जिससे ऐसा आभास हो रहा है कि जैसे रेलवे स्कूल की पैरेंट-टीचर्स एसोसिएशन कोई निजी संस्था हो और उसकी संपत्ति रेलवे की न होकर कोई निजी संपत्ति हो तथा इसमें विवाद के चलते यह रिकवरी नहीं की जानी चाहिए. जबकि पता चला है कि जनवरी 2008 में पूर्व प्राचार्य ने स्टाक वेरिफिकेशन के समय जो संपत्ति बताई थी, और तीन साल बाद उनके ट्रांसफ़र के पश्चात् इस दरम्यान की गई खरीद सहित रेलवे द्वारा दुबारा कराए गए स्टाक वेरिफिकेशन में जो संपत्ति मिली, उसमे पाई गई विसंगति के लिए ही पूर्व पीएचएम से रिकवरी की जा रही है, क्योंकि इस दौरान स्कूल की कंप्यूटर लैब, कंप्यूटर लाइब्रेरी और कुछ महत्वपूर्ण अलमारियों की चाबियाँ स्वयं अपने पास रखते हुए इसकी इंचार्ज पूर्व पीएचएम ही थीं. यही नहीं, नए प्राचार्य द्वारा स्कूल का चार्ज संभाले जाने के करीब एक महीने बाद काफी दबाव के चलते कुछ चाबियाँ सौंपी थीं और कुछ चाबियाँ तो उन्होंने लगभग चार महीने बाद प्राचार्य को दी थीं. यह सब रिकॉर्ड में है, परन्तु कुछ कार्मिक अधिकारियों और निचले स्तर के कार्मिक स्टाफ की मिलीभगत के चलते उन्हें आज तक इन सब मामलों में कोई चार्जशीट नहीं दी गई है, जबकि ऐसे ही एक मामले में एक महिला टीचर को 31 अक्तूबर 2011 को उसके रिटायर्मेंट के दिन चार्जशीट थमा दी गई थी.
उल्लेखनीय है कि अपने भ्रष्टाचार से बचने के लिए पूर्व पीएचएम ने स्कूल में लगातार विवाद और अशांति बनाए रखी थी. अब जब उनकी तमाम गतिविधियों, चालाकियों और पूर्व प्राचार्य के साथ मिलकर की गई वित्तीय गड़बड़ियों में मिलीभगत की पोल खुल गई है और रेल प्रशासन ने गंभीर जाँच के बाद उनकी जिम्मेदारी तय करते हुए उनसे रिकवरी शुरू कर दी है, तो वह बौखलाकर कैट में यह दावा करने पहुँच गई हैं कि यह सारी संपत्ति किसी प्राइवेट ट्रस्ट की है, जो कि विवादित है, इसलिए उनसे इसकी रिकवरी नहीं की जानी चाहिए. जबकि सच्चाई इसके विपरीत है, क्योंकि रेलवे ने आजतक अपनी प्रापर्टी पर कभी किसी प्राइवेट संस्था को चलने या चलाने की अनुमति नहीं दी है. रेलवे ने स्कूल में के. जी. क्लासेस चलाने की अनुमति दी थी, जिसके लिए रेलवे बोर्ड ने तीन शर्तें रखी हैं. पहली यह कि कोई पैरेंट-टीचर्स संस्था पंजीकृत और अविवादित होनी चाहिए, दूसरी यह कि संस्था को यह क्लासेस चलाने की अनुमति प्रतिवर्ष लेनी होगी, तीसरी यह कि रेलवे अथवा रेलवे स्कूल की संपत्ति, इमारत, जमीन, फर्नीचर और मैन पावर आदि पर संस्था का न तो कोई अधिकार होगा, और न ही तत्संबंधी कोई एग्रीमेंट संस्था के साथ किया जाएगा. इन शर्तों के चलते सिर्फ काम के अलावा अन्य कोई अधिकार रेलवे ने किसी को नहीं दिया है. तब इसे विवादास्पद बताकर कोई रिकवरी रोके जाने का दावा कैसे किया जा सकता है. जबकि आज ऐसा कोई विवाद भी नहीं है. यदि ऐसा कोई विवाद कभी था भी, तो वह बहुत पहले उपरोक्त शर्तों के मद्देनजर रेल प्रशासन द्वारा सुलझा लिया गया था.
बताते हैं कि उपरोक्त कथित विवाद भी पूर्व प्राचार्य उर्फ़ 'भ्रष्टाचार्य' द्वारा तत्कालीन कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से यह सोचकर पैदा किया गया था कि जब तक यह विवाद सुलझेगा तब तक तो वह इस स्कूल को पूरी तरह से लूटकर और रिटायर होकर दुनिया से भी चला जाएगा, और यदि बाद में उसे दोषी भी पाया गया, तो तब क्या उससे वसूली (रिकवरी) करने के लिए रेल प्रशासन उसके खिलाफ 'नरक' में सम्मन भेजेगा? मगर स्कूल के ही कुछ टीचर्स की समझदारी के चलते 'भ्रष्टाचार्य महोदय' अपनी इस कुत्सित कोशिश में कामयाब नहीं हो पाए थे, बल्कि उनकी 'चोरी' ध्यान में आते ही रेल प्रशासन ने उन्हें पद के साथ कल्याण से उठाकर दौंड में फेंक दिया था. मगर इन भ्रष्टाचार्य महोदय को 'घोषित डकैत' मानने और अन्य किसी रेलवे द्वारा उन्हें अपने यहाँ लेने से मना कर दिए जाने के बावजूद वर्तमान मुख्य कार्मिक अधिकारी ने उन्हें रेलवे से बर्खास्त किए जाने सम्बन्धी अपने और रेलवे के अधिकार का उपयोग आजतक नहीं किया है, जिससे एक आशंका यह भी बनती है कि उनकी भी मिलीभगत इन भ्रष्टाचार्य महोदय और उनकी चांडाल चौकड़ी के साथ रही हो सकती है?