चलती गाड़ी में फिर आग...
तमाम सावधानियों और पूर्व सावधानियों के बावजूद पिछले दो-तीन साल से चलती गाड़ियों में आग लगने की घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं. कहीं आमने-सामने से टक्कर हो रही है, कहीं आगे से तो कहीं पीछे से आकार गाड़ियाँ टकरा रही हैं, और कहीं एक-दूसरे पर चढ़ जा रही हैं. इस तरह सैकड़ों रेल यात्री असमय काल-कवलित हो रहे है, मगर यह रेल दुर्घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. सोमवार, 30 जुलाई को सुबह करीब साढ़े चार बजे हैदराबाद - चेन्नई के बीच दिल्ली - चेन्नई तमिलनाडु एक्सप्रेस के एक स्लीपर कोच में लगी आग भी लगभग 30 से ज्यादा रेल यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हुई. दुर्घटनाग्रस्त कोच से किसी तरह जिन्दा बच निकले यात्रियों का कहना है कि टायलेट के पास शार्ट सर्किट से यह आग लगी थी, लेकिन सुबह की नींद में निर्द्वंद होकर डूबे यात्रियों को जब तक भीषण आग के खतरे का आभाष हो पाता, तब तक काफी देर हो चुकी थी और ऐसे 30 निर्दोष लोग आग की भेंट चढ़ गए. जिन यात्रियों ने ट्रेन से कूदकर अपनी जान बचाने की कोशिश की, उन्हें पता चला कि कोच के चार में से दो दरवाजे लॉक हो गए थे. इस दुर्घटना की भीषणता शायद और ज्यादा होती, परन्तु आग लगने के बाद यह ट्रेन जब एक छोटे स्टेशन से होकर गुजर रही थी, तब उसके स्टेशन मास्टर ने गाड़ी में लगी आग को देख लिया और किसी तरह से ट्रेन को थोड़ी दूरी पर रोक लिया. जिससे आग अन्य डिब्बों तक नहीं फैली.
यह सुनी-सुनाई जानकारियां जैसे सर्वसामान्य लोगों तक पहुंची हैं, वैसे ही रेलमंत्री मुकुल राय तक भी पहुँच ही गई होंगी. लेकिन इस पूरे मामले में उनकी प्रतिक्रिया बेहद शर्मनाक और औपचारिक ही रही है. उन्होंने दुर्घटना में मृत और घायल यात्रियों के लिए मुआवजे की घोषणा करके और एक कमेटी का गठन करके अपने कर्त्तव्य कि इतिश्री कर ली. कमेटी को यह पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है कि क्या यह आग सचमुच शार्ट सर्किट से ही लगी थी, या उक्त डिब्बे में कोई यात्री ज्वलनशील पदार्थ लेकर यात्रा कर रहा था. रेलमंत्री के लिए यह एक सामान्य दुर्घटना हो सकती है, मगर लाखों - करोड़ों रुपये और कीमती समय खर्च करके भी रेलवे की इस उच्चाधिकार प्राप्त समिति का इस दुर्घटना पर किसी स्पष्ट नतीजे पर पहुंचना आवश्यक है. ऐसी रेल दुर्घटनाओं के बारे में पिछले रेल बजट से पहले ही काकोडकर कमेटी ने कई ठोस सुझाव रेलवे बोर्ड को अपनी रिपोर्ट में दिए थे और उन पर अमल करने की घोषणा भी तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने अपने रेल बजट में की थी. बहुत समय के बाद रेल की चिंता करने वाला कोई रेलमंत्री रेलवे को मिला था, मगर ममता बनर्जी की तुनकमिजाज राजनीति के चलते संसद में रेल बजट पेश करने के तुरंत बाद दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री पद से हटा दिया गया और उनकी जगह लाए गए मुकुल राय ने जो रेल बजट पास करवाया, उसमें दिनेश त्रिवेदी की ऐसी सभी घोषणाओं को कूड़ेदान में डाल दिया गया था.
अब यही मुकुल राय रेल बजट के बाद से लगातार हो रही ऐसी भीषण रेल दुर्घटनाओं की जाँच के लिए थोक में समितियों का गठन करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान ले रहे हैं और मीडिया में अलाप रहे हैं कि प्रधानमंत्री से रेलवे सेफ्टी के लिए फंड की व्यवस्था करने की मांग वह काफी पहले कर चुके हैं, जैसे प्रधानमंत्री ने उनकी और उनकी पार्टी की घटिया राजनीति का खामियाजा भुगतने का ठेका ले रखा है. मुकुल राय अपनी आका ममता बनर्जी कि पूंछ पकड़कर उनसे ज्यादा कोलकाता में रहकर रेल को हांक रहे हैं, रेल के लिए यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. राल्मंत्री और उनकी आका खुद तो लोक-लुभावन घोषणाएं करें, और रेलवे के तमाम संसाधनों का इस्तेमाल अपनी घटिया राजनीति को चमकाने के लिए करें मगर रेल के विकास एवं सेफ्टी के लिए पैसा प्रधानमंत्री दें. क्या मुकुल राय और ममता बनर्जी ने ही सिर्फ अपनी मां का दूध पिया है, बाकी लोग क्या अपने बाप का अंगूठा चूसकर बड़े हुए हैं, जो यह दोनों खुदगर्ज लोग देश के बाकी लोगों को मूर्ख समझ रहे हैं? अभी कुछ ही दिनों पहले कोलकाता से चलने वाली एक गाड़ी इसी प्रकार दुर्घटनाग्रस्त हुई थी, तब ममता बनर्जी ने उसे 'षड़यंत्र' बताया था, जबकि अन्य जगहों पर होने वाली रेल दुर्घटनाओं पर वे कुछ भी कहना जरूरी नहीं समझती हैं. इस हद तक उथली, छिछली और स्वार्थी हो चुकी राजनीति से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह पूरे व्यवसायिक ढंग से रेल को चलाएगी और लाखों निर्दोष रेल यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा-संरक्षा करेगी?
इधर मुंबई में आए दिन प. रे. के मुट्ठी भर मोटरमैनो की मनमानी से लाखों उपनगरीय रेल यात्रियों को मुशीबत का सामना करना पड़ रहा है. इस मुद्दे पर भी रेलमंत्री मुकुल राय के मुंह से एक बोल तक नहीं फूटा है. पिछले पंद्रह दिनों के अन्दर प. रे. के मोटरमैनो ने दो बार मुंबई और यहाँ के लाखों यात्रियों को बंधक बनाया है, मगर रेल प्रशासन और रेलमंत्री ने उनकी नकेल कसने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया है. यहाँ तक कि म. रे. की तरह कैडर मर्जर पर भी अब तक पूरी तरह से अमल नहीं किया गया है. इस संबंध में सिर्फ मोटरमैन कैडर में सीधी भर्ती को ख़त्म करके प्रशासन ने अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है. मोटरमैनो की मनमानी को देखते हुए अब मुंबई के करीब अस्सी लाख उपनगरीय रेल यात्रियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया है. यदि इस मामले में मोटरमैनो की नकेल शीघ्र ही नहीं कसी गई तो यात्रियों का यह गुस्सा अब कभी-भी फूट सकता है. इसी आशंका के मद्देनजर महाराष्ट्र विधान सभा में मोटरमैनो की मनमानी को विधायको ने मुद्दा बनाया और विधायकों की चिंता को देखते हुए ही मुख्यमंत्री को रेल मंत्रालय को चिट्ठी लिखनी पड़ी है. यानि अब यह मुद्दा केवल केंद्र का नहीं, बल्कि राज्य की चिंता का भी विषय बन गया है, जहाँ मात्र मुट्ठी भर उद्दंड मोटरमैनो की मनमानी के चलते भारी अशांति और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई है.